नई दिल्ली। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे ने जेल में बंद कार्यकर्ता उमर खालिद को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताए जाने पर सवाल उठाया है। उन्होंने बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) में उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री की प्रस्तावित स्क्रीनिंग को स्थायी रूप से रद्द करने की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की मांग की आलोचना की।
प्रियंक खड़गे ने कहा कि आखिर उमर खालिद को ‘राष्ट्र-विरोधी’ किसने घोषित किया है और क्या किसी अदालत ने ऐसा कहा है? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा है तो लंबे समय से जेल में रहने के बावजूद सुनवाई आगे क्यों नहीं बढ़ रही है। खड़गे ने कहा कि विश्वविद्यालय में इस तरह की गतिविधियों को लेकर डर या दबाव का माहौल स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
ABVP की बेंगलुरु इकाई ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी और कानून एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र भेजकर NLSIU में प्रस्तावित डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग को पूरी तरह और स्थायी रूप से रद्द करने की मांग की है। ABVP ने विश्वविद्यालय से डॉक्यूमेंट्री को फिल्माने, दिखाने या उसका प्रचार करने की अनुमति भी न देने की मांग की है।
ललित वाचानी की डॉक्यूमेंट्री ‘मिस्टर खालिद: प्रिजनर नंबर 626710’ को NLSIU की लॉ एंड सोसाइटी समिति की ओर से 14 सितंबर को ‘पॉलिटिकल प्रिजनर्स डे’ के अवसर पर दिखाया जाना प्रस्तावित था। ABVP और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों के विरोध के बाद स्क्रीनिंग स्थगित कर दी गई। विश्वविद्यालय के छात्रों ने सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाओं से जुड़ी चिंताओं का भी हवाला दिया था।
स्क्रीनिंग नहीं होने के बाद 14 सितंबर की शाम छात्रों ने एक रीडिंग सेशन आयोजित किया। इसमें उमर खालिद के परिवार और दोस्तों को लिखे गए हालिया पत्रों को पढ़ा गया। इसके साथ ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर भी चर्चा की गई।
उमर खालिद और शरजील इमाम समेत कई लोगों को 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के मामले में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया है कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के पीछे बड़ी साजिश थी। इस मामले में यूएपीए समेत कई धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है। वहीं, लंबे समय से चल रही न्यायिक हिरासत को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आलोचकों ने सवाल उठाए हैं और इसे असहमति की आवाजों के खिलाफ कठोर कानूनों के इस्तेमाल से जोड़कर देखा है।

