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पश्चिम बंगाल SIR: हटाए गए मतदाताओं की 18.78 लाख अपीलें अब भी लंबित, सिर्फ 1.95% मामलों पर फैसला

पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए मतदाताओं की बड़ी संख्या में अपीलें अब भी लंबित हैं। सिविक रिसर्च ग्रुप (CRG) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 28 सितंबर तक हटाए गए मतदाताओं की 18.78 लाख से अधिक अपीलों पर कोई फैसला दर्ज नहीं हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार, कुल 19,15,941 अपीलों में से सिर्फ 37,272 मामलों में ही न्यायाधिकरण का फैसला दर्ज किया गया।

CRG के आंकड़ों के मुताबिक, जिन 37,272 मामलों पर फैसला दर्ज हुआ, उनमें 30,828 अपीलों को मंजूरी मिली, जबकि 6,444 अपीलें खारिज कर दी गईं। यानी दर्ज किए गए फैसलों में 82.71 प्रतिशत मामलों में मतदाताओं के पक्ष में फैसला हुआ। हालांकि, CRG ने स्पष्ट किया है कि इन मामलों की संख्या कुल लंबित अपीलों की तुलना में बहुत कम है और इन आंकड़ों के आधार पर लंबित मामलों के संभावित नतीजे का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

रिपोर्ट के अनुसार, शोध की शुरुआत SIR के अधिनिर्णय चरण में हटाए गए 27,05,162 मतदाताओं के रिकॉर्ड से हुई थी। इनमें से 25,75,663 मतदाता पहचान संख्या यानी EPIC नंबरों को संसाधित किया गया और 23,42,259 नंबरों की चुनाव आयोग के पोर्टल पर पुष्टि हो सकी। इन सत्यापित रिकॉर्ड में 81.80 प्रतिशत मतदाताओं की अपील दर्ज मिली। कुल अपीलों में 17,67,095 ऑनलाइन और 1,48,846 ऑफलाइन आवेदन थे।

रिपोर्ट में जिलों के बीच अपीलों पर कार्रवाई की गति में भी बड़ा अंतर सामने आया है। हुगली में अकेले 20,703 मामलों पर फैसला दर्ज हुआ, जो पूरे राज्य में दर्ज फैसलों का 55.55 प्रतिशत है। वहीं, सबसे ज्यादा अपील वाले मुर्शिदाबाद में सिर्फ 275 मामलों में फैसला दर्ज हुआ। राज्य की 31 विधानसभा सीटों में अब तक किसी भी अपील पर न्यायाधिकरण का फैसला दर्ज नहीं किया गया था।

CRG का कहना है कि चुनाव आयोग की ओर से अपील मामलों की कोई समेकित स्थिति रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। इसी वजह से शोधकर्ताओं को प्रत्येक EPIC नंबर के आधार पर अपील की स्थिति की जांच करनी पड़ी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चुनावी रिकॉर्ड इमेज आधारित पीडीएफ में उपलब्ध होने और 18 सितंबर से ओटीपी की अनिवार्यता के कारण स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना अधिक मुश्किल हो गया।

हालांकि, CRG ने अपने आंकड़ों को अंतिम तथ्य नहीं बल्कि परिचालन संकेतक बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, रिकॉर्ड अधूरे होने, पोर्टल पर स्थिति अपडेट होने में अंतर और लंबित मामलों की समीक्षा जैसे कारणों से आंकड़ों में बदलाव संभव है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ये आंकड़े केवल उन मतदाताओं की अपील से संबंधित हैं जिन्हें SIR के दौरान सूची से बाहर किया गया और इसमें चुनाव आयोग या अन्य पक्षों की ओर से मतदाताओं को सूची में शामिल किए जाने के खिलाफ दायर अपीलें शामिल नहीं हैं।

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