Journo Mirror
India

कश्मीर: मस्जिदों के जुमे के खुत्बे तय करने के वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव पर विवाद, उमर अब्दुल्ला समेत कई नेताओं ने जताया विरोध

जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से केंद्र शासित प्रदेश की मस्जिदों और धार्मिक स्थलों में जुमे की नमाज के दौरान दिए जाने वाले खुत्बों (धार्मिक उपदेशों) के विषय एक समान तय करने के प्रस्ताव पर विवाद खड़ा हो गया है। राजनीतिक नेताओं और धार्मिक संगठनों ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए इसे मुस्लिम धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बताया है। मक्तूब मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, वक्फ बोर्ड ने मुफ्तियों, इमामों और खतीबों की एक समिति गठित करने का फैसला किया है, जो जुमे के खुत्बों के लिए साझा विषयों की पहचान कर उन्हें अंतिम रूप देगी।

यह फैसला शनिवार को श्रीनगर स्थित वक्फ बोर्ड के केंद्रीय कार्यालय में आयोजित धार्मिक विद्वानों की बैठक में लिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर के विभिन्न मतों और धार्मिक विचारधाराओं से जुड़े करीब 1,500 मुफ्तियों, इमामों और इस्लामी विद्वानों ने बैठक में हिस्सा लिया, जबकि जम्मू क्षेत्र के कुछ धार्मिक नेताओं ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भाग लिया। प्रस्तावित समिति पहले से खुत्बों के विषय निर्धारित करेगी और संबंधित धार्मिक विद्वानों तक उनकी जानकारी पहुंचाएगी। बोर्ड के मुताबिक, इन विषयों में धार्मिक जागरूकता, नैतिक मूल्यों, सामाजिक सद्भाव, एकता और सामुदायिक हितों से जुड़े मुद्दे शामिल होंगे।

जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष और भाजपा नेता डॉ. सैयद दरख्शां अंद्राबी ने इस पहल का बचाव करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य धार्मिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और नैतिक जिम्मेदारी, एकता तथा सद्भाव को बढ़ावा देना है। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने इसे मुस्लिम धार्मिक मामलों में भाजपा के हस्तक्षेप की अस्वीकार्य कोशिश बताते हुए अंद्राबी से इस पहल को रोकने की मांग की।

श्रीनगर से सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने भी प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यदि मस्जिदों का मिम्बर (धार्मिक उपदेश देने का स्थान) राजनीतिक सत्ता के सामने झुक जाता है, तो उसका उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। उन्होंने इस पहल को धार्मिक आस्था पर हमला करार देते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की। उनका कहना था कि मस्जिदों में धार्मिक विद्वान क्या कहेंगे, यह तय करने का अधिकार किसी समिति को नहीं दिया जाना चाहिए।

मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले धार्मिक और सामाजिक संगठनों के संगठन मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू) ने भी प्रस्ताव को खारिज कर दिया। मंगलवार को जारी बयान में संगठन ने कहा कि किसी वैधानिक संस्था द्वारा मस्जिदों में दिए जाने वाले उपदेशों के विषय तय करने या उन्हें नियंत्रित करने का विचार ही अस्वीकार्य है। संगठन के मुताबिक, धार्मिक मार्गदर्शन की जिम्मेदारी इस्लामी विद्वानों, इमामों और मान्यता प्राप्त धार्मिक संस्थाओं की है। उसने वक्फ बोर्ड से धार्मिक उपदेशों में हस्तक्षेप करने के बजाय वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, रखरखाव और सुरक्षा पर ध्यान देने की अपील की।

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने भी सवाल उठाया कि मस्जिदों में दिए जाने वाले खुत्बों के विषय तय करने का अधिकार किसके पास है। उन्होंने वक्फ बोर्ड को जम्मू-कश्मीर सरकार के अधीन किए जाने की मांग की। नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान डार ने आरोप लगाया कि इस प्रस्ताव के जरिए भाजपा कश्मीर की मस्जिदों में दिए जाने वाले जुमे के खुत्बों की सामग्री तय करना चाहती है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता तनवीर सादिक और सलमान अली सागर ने भी प्रस्ताव की आलोचना की और धार्मिक उपदेशों में राजनीतिक दखल पर सवाल उठाए।

पीडीपी नेता और लाल चौक के विधायक अहसान परदेसी ने कहा कि धार्मिक आस्था को निर्देशों के जरिए नियंत्रित नहीं किया जा सकता और धार्मिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं होना चाहिए। श्रीनगर के पूर्व मेयर जुनैद मट्टू ने भी इस प्रस्ताव को कश्मीर के धर्म, संस्कृति, भाषा और इतिहास पर हमला बताया। विरोध करने वाले नेताओं और संगठनों का कहना है कि धार्मिक विद्वानों के बीच स्वैच्छिक समन्वय और किसी सरकारी संस्था द्वारा खुत्बों के विषय निर्धारित करने में अंतर है। उनके मुताबिक, इस तरह का प्रशासनिक हस्तक्षेप धार्मिक स्वतंत्रता और इमामों की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है।

कश्मीर में धार्मिक गतिविधियों को लेकर पहले भी विवाद सामने आते रहे हैं। श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में शुक्रवार की सामूहिक नमाज और प्रमुख धार्मिक अवसरों पर नमाज की अनुमति कई बार नहीं दिए जाने के मामले भी चर्चा में रहे हैं। फिलहाल, वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक और धार्मिक संगठनों का विरोध जारी है। विवाद का मुख्य सवाल यह है कि मस्जिदों में धार्मिक उपदेशों के विषय तय करने का अधिकार धार्मिक विद्वानों के पास रहना चाहिए या वक्फ बोर्ड जैसी प्रशासनिक संस्था इसमें भूमिका निभा सकती है।

Related posts

Leave a Comment