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2026 में अब तक सीवर और सेप्टिक टैंकों में 125 लोगों की मौत, दलित और प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल

भारत में सीवर, सेप्टिक टैंक और अन्य बंद जगहों में खतरनाक सफाई तथा रखरखाव के काम के दौरान वर्ष 2026 में अब तक कम से कम 125 लोगों की मौत हो चुकी है। दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (डीएएसएएम) की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी से 2 अक्टूबर 2026 के बीच देश के 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ये मौतें दर्ज की गईं। संगठन ने इन घटनाओं को केवल दुर्घटना नहीं, बल्कि जातिगत भेदभाव, ठेकेदारों के शोषण, सुरक्षा उपायों की कमी और सरकारी व्यवस्था की विफलता से जुड़ा गंभीर संकट बताया है।

डीएएसएएम ने 5 अक्टूबर को नई दिल्ली में जारी बयान में कहा कि सीवर, सेप्टिक टैंक, मैनहोल, नालों, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, भूमिगत पानी की टंकियों और अन्य बंद संरचनाओं में सफाई तथा रखरखाव के दौरान मजदूरों की जान जा रही है। मरने वालों में सफाईकर्मी, संविदा मजदूर, निर्माण श्रमिक और प्रवासी मजदूर शामिल हैं। संगठन के अनुसार, कई घटनाओं में जहरीली गैसों के कारण मजदूर बेहोश हो गए या ऑक्सीजन की कमी से उनकी मौत हो गई। कुछ मामलों में एक मजदूर को बचाने के लिए अंदर गए दूसरे लोग भी जहरीली गैसों की चपेट में आकर जान गंवा बैठे।

संगठन के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 सबसे घातक महीना रहा, जब 28 मौतें दर्ज की गईं। मार्च में 25, जून में 20, मई में 19, फरवरी में एक, अप्रैल में 10, अगस्त में 10, सितंबर में नौ और अक्टूबर में 2 तारीख तक तीन मौतें दर्ज की गईं। राज्यवार आंकड़ों में बिहार में 14, तमिलनाडु में 12, हरियाणा में 11 और उत्तर प्रदेश में 10 मौतें दर्ज की गईं। मेघालय और ओडिशा में नौ-नौ, मध्य प्रदेश में आठ, असम और महाराष्ट्र में सात-सात तथा छत्तीसगढ़ में छह मौतें सामने आईं। हालांकि, संगठन के दस्तावेज में कुछ आंकड़ों को लेकर विसंगतियां भी हैं। राज्यवार आंकड़ों का कुल योग 126 है, जबकि कुल मौतों की संख्या 125 बताई गई है।

डीएएसएएम ने कहा कि इन मौतों के पीछे जाति आधारित श्रम व्यवस्था और आर्थिक असमानता की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। संगठन के मुताबिक, ऐतिहासिक रूप से दलित समुदायों, विशेषकर वाल्मीकि और अन्य वंचित जातियों के लोगों को सफाई के सबसे खतरनाक और अपमानजनक कामों में लगाया जाता रहा है। वहीं, ठेकेदारों के जरिए काम पर रखे जाने वाले प्रवासी और आर्थिक रूप से कमजोर मजदूर भी असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। कई मजदूरों को न तो लिखित अनुबंध मिलता है और न ही पर्याप्त प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण, बीमा या सामाजिक सुरक्षा की सुविधा उपलब्ध होती है।

रिपोर्ट में मुंबई, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु, राजस्थान और अन्य राज्यों में हुई कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है। जून में दिल्ली के मुंडका औद्योगिक क्षेत्र में एक फैक्ट्री के सेप्टिक टैंक में जहरीली गैस की चपेट में आने से तीन मजदूरों की मौत हो गई थी। संगठन के अनुसार, मजदूरों के परिजनों ने आरोप लगाया कि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, गैस जांचने की व्यवस्था और बचाव प्रणाली उपलब्ध नहीं कराई गई थी। इसी तरह, बिहार के वैशाली जिले में मार्च के दौरान एक घर के सेप्टिक टैंक की सफाई से जुड़ी घटना में एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत दर्ज की गई थी। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि खतरा केवल नगरपालिकाओं के सीवर तक सीमित नहीं, बल्कि निजी घरों, अस्पतालों, कारखानों और आवासीय परिसरों में भी मौजूद है।

डीएएसएएम ने हाथ से मैला ढोने पर रोक लगाने और पुनर्वास का प्रावधान करने वाले कानून के कमजोर क्रियान्वयन पर भी सवाल उठाए। संगठन ने मांग की कि सीवर और सेप्टिक टैंक में काम के दौरान होने वाली प्रत्येक मौत की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो तथा जिम्मेदार ठेकेदारों, नियोक्ताओं, संपत्ति मालिकों और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। संगठन ने प्रत्येक मृतक के परिवार को कम से कम 30 लाख रुपये मुआवजा देने, पात्र आश्रितों को सरकारी रोजगार और परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास तथा आजीविका संबंधी सहायता उपलब्ध कराने की मांग की।

संगठन ने सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने, बिना गैस जांच और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के किसी भी मजदूर को बंद जगह में प्रवेश नहीं कराने तथा प्रशिक्षित बचाव दल की व्यवस्था अनिवार्य करने की मांग की। डीएएसएएम के मुताबिक, ठेकेदारों के जरिए काम कराने से मुख्य नियोक्ता या सरकारी संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। संगठन ने केंद्र और राज्य सरकारों से देशभर में ऐसी मौतों का पारदर्शी रिकॉर्ड तैयार करने और खतरनाक सफाई कार्यों को रोकने के लिए प्रभावी राष्ट्रीय रणनीति लागू करने की अपील की है।

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