अहमदाबाद की एक विशेष पोटा (आतंकवाद निवारण अधिनियम) अदालत ने अक्षरधाम मंदिर हमले के मामले में गिरफ्तार किए गए तीन मुस्लिम पुरुषों को छह साल बाद बरी कर दिया है।
यह फैसला न्यायाधीश हेमांग आर. रावल की अध्यक्षता वाली विशेष अदालत ने सुनाया। अदालत ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ ऐसा कोई नया या ठोस सबूत पेश नहीं किया गया, जो पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जा चुके तथ्यों से अलग हो।
अदालत ने जिन तीन लोगों को बरी किया, उनमें अब्दुल राशिद सुलेमान अजमेरी, मोहम्मद फारूक मोहम्मद हाफिज शेख और मोहम्मद यासीन उर्फ यासीन भट्ट शामिल हैं।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले में मुख्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर चुका है और उसके बाद से कोई नया तथ्य सामने नहीं आया है, इसलिए तीनों की रिहाई जरूरी है।
अब्दुल राशिद सुलेमान अजमेरी और मोहम्मद फारूक शेख वर्ष 2002 में हुए हमले के समय भारत में मौजूद नहीं थे और सऊदी अरब में काम कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें फरार घोषित किया गया और 2019 में भारत लौटने पर क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले इसी मामले में आदम सुलेमान अजमेरी और सलीम हनीफ शेख को भी सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया था।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इस मामले में आरोपियों को कानूनी सहायता प्रदान की। संगठन के अध्यक्ष अरशद मदनी ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे न्याय की जीत बताया, लेकिन साथ ही इस बात पर अफसोस जताया कि निर्दोष लोगों को न्याय मिलने में छह साल लग गए। उन्होंने कहा कि इस देरी ने न्याय प्रणाली की गंभीर खामियों को उजागर किया है।
गौरतलब है कि 2007 में पोटा अदालत ने इस मामले में कई लोगों को मौत और उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे 2010 में गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था। हालांकि 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपियों को अपर्याप्त सबूतों के आधार पर बरी करते हुए गुजरात पुलिस और जांच एजेंसियों को निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए कड़ी फटकार लगाई थी।

