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‘क्या मैं अब भी नागरिक हूं?’ मतदाता सूची से नाम हटने पर बंगाल के दिहाड़ी मजदूर रफीकुल शेख ने पूछा

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के डोमकल नगरपालिका क्षेत्र के रहने वाले दिहाड़ी मजदूर रफीकुल शेख इन दिनों अपनी पहचान को लेकर परेशान हैं। उनका कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान उनका नाम मतदाता सूची से बाहर हो गया। रफीकुल दिहाड़ी मजदूरी करने के साथ कभी-कभी झालमुरी बेचकर अपने परिवार का खर्च चलाते हैं। अब उन्हें डर है कि मतदाता सूची से नाम हटने का असर सिर्फ मतदान के अधिकार तक सीमित नहीं रहेगा।

रफीकुल के परिवार के मुताबिक, SIR सत्यापन के दौरान कथित तौर पर छह अन्य लोगों ने उनके पिता को अपना पिता होने का दावा किया। इसके बाद रफीकुल को नोटिस भेजकर अधिकारियों के सामने पेश होने को कहा गया। परिवार का कहना है कि उन्होंने पहचान, पारिवारिक संबंध और नागरिकता से जुड़े दस्तावेज अधिकारियों के सामने जमा किए, लेकिन इसके बावजूद अंतिम मतदाता सूची में रफीकुल का नाम नहीं आया। उनकी 24 वर्षीय बेटी शिउली खातून का नाम भी सूची में शामिल नहीं है।

रफीकुल ने कहा, “मेरी मां का नाम 2002 की मतदाता सूची में है। हमने अपने परिवार से संबंधित सभी दस्तावेज जमा कर दिए थे। इसके बावजूद मेरा और मेरी बेटी का नाम सूची से बाहर रह गया है। अब लोग मुझे शक की नजरों से देख रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे मुझे अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड़ रहा है।” उनका दावा है कि नाम हटने के बाद परिवार को मिलने वाले राशन संबंधी लाभ पर भी असर पड़ा है।

परिवार का कहना है कि वे वर्षों से इसी इलाके में रह रहे हैं और इससे पहले उनकी नागरिकता या निवास को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठाया गया। स्थानीय पड़ोसियों ने भी रफीकुल के लंबे समय से वहां रहने की पुष्टि की है। मानवाधिकार कार्यकर्ता अब्दुल गनी ने कहा कि गरीब परिवारों के लिए सरकारी दफ्तरों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के लगातार चक्कर लगाना बेहद मुश्किल होता है, क्योंकि हर दिन कार्यालय जाने का मतलब मजदूरी का नुकसान और अतिरिक्त खर्च है।

रफीकुल का कहना है कि पिछले कई महीनों से वह कभी ब्लॉक कार्यालय तो कभी चुनाव से जुड़े दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। उन्होंने कहा, “एक तरफ नौकरी को लेकर अनिश्चितता है और दूसरी तरफ जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। मुझे नहीं पता कि मेरा नाम कब तक बहाल होगा।” परिवार को यह डर भी सता रहा है कि कहीं उन्हें “विदेशी” या “अवैध प्रवासी” न समझ लिया जाए।

फिलहाल रफीकुल की मांग साफ है—वह अपना और अपनी बेटी का नाम मतदाता सूची में दोबारा शामिल कराना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “मुझे विश्वास है कि मैं इस देश का नागरिक हूं और मेरे पास जरूरी दस्तावेज हैं। मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूं कि हमारा नाम क्यों हटाया गया और इसे कब बहाल किया जाएगा।” उनके लिए SIR प्रक्रिया अब महज मतदाता सूची का मामला नहीं, बल्कि पहचान, सम्मान और नागरिक अधिकारों से जुड़ा संघर्ष बन गई है।

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