पटना: नागरिक अधिकार संगठन एपीसीआर (एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स) के एक प्रतिनिधिमंडल ने बिहार के मधुबनी और सिवान जिलों का दौरा कर मॉब लिंचिंग की अलग-अलग घटनाओं में जान गंवाने वाले पीड़ितों के परिवारों से मुलाकात की।
प्रतिनिधिमंडल ने घटनाओं की जांच की प्रगति का आकलन किया, कानूनी सहायता का भरोसा दिया और पीड़ित परिवारों के प्रति एकजुटता व्यक्त की।
प्रतिनिधिमंडल ने सबसे पहले मधुबनी जिले के पुलपरास क्षेत्र का दौरा किया, जहां 25 फरवरी 2026 को रोशन खातून पर कथित तौर पर भीड़ ने हमला किया था। परिवार का आरोप है कि हमले के दौरान पुलिस ने समय पर सुरक्षा और सहायता उपलब्ध नहीं कराई।
गंभीर रूप से घायल रोशन खातून की बाद में मौत हो गई। एपीसीआर ने इस मामले में गिरफ्तार एकमात्र आरोपी को जमानत मिलने पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे न्याय प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।
एपीसीआर टीम ने झंझारपुर निवासी दिहाड़ी मजदूर कयूम के परिवार से भी मुलाकात की। कयूम की 13 जनवरी 2026 को कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। परिवार का कहना है कि घटना के कई महीने बाद भी पुलिस केवल एक आरोपी को ही गिरफ्तार कर सकी है।
कयूम की पत्नी और चार छोटे बच्चों को अब तक किसी प्रकार का सरकारी मुआवजा या पुनर्वास सहायता नहीं मिली है। संगठन ने परिवार को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की बात कही।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि राज्य सरकार को ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों को निर्धारित मुआवजा, पुनर्वास और अन्य वैधानिक सहायता तत्काल उपलब्ध करानी चाहिए।
सिवान जिले में एपीसीआर प्रतिनिधिमंडल ने शाहजाद अली के परिवार से मुलाकात की। परिवार के अनुसार, शाहजाद अली का कथित रूप से अपहरण कर उन्हें एक पेड़ से बांध दिया गया और बेरहमी से पीटा गया, जिससे उनकी मौत हो गई। मृतक की पत्नी मोबीना खातून द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी अब तक नहीं होने पर परिवार ने चिंता जताई है।
दौरे के दौरान एपीसीआर ने बड़हरिया थाना अधिकारियों को एक ज्ञापन सौंपकर मामले की निष्पक्ष, समयबद्ध और स्वतंत्र जांच की मांग की। संगठन ने सभी आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी, पीड़ित परिवार की सुरक्षा और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी मांग की।
एपीसीआर ने कहा कि बिहार में मॉब लिंचिंग की इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच, दोषियों की गिरफ्तारी, पीड़ित परिवारों को मुआवजा और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। संगठन का कहना है कि इन मामलों में देरी और लापरवाही कानून के शासन तथा न्याय व्यवस्था में लोगों के विश्वास को कमजोर करती है।

