दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) से इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) का आधिकारिक अकाउंट और उसकी छह पोस्ट हटाने की मांग की है। इसके अलावा सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC), @geoblockedindia के अकाउंट और 16 अन्य सोशल मीडिया यूजर्स की पोस्ट हटाने के लिए भी नोटिस भेजे गए हैं।
दिल्ली पुलिस ने इन पोस्ट को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खिलाफ कथित रूप से मानहानिकारक बताते हुए भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 का हवाला दिया है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने इस कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताते हुए दिल्ली पुलिस से दोनों नोटिस वापस लेने की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि नोटिस वापस नहीं लिए गए तो वह अदालत में चुनौती देगा।
IFF के मुताबिक, 29 अक्टूबर 2026 को संगठन, SFLC और @geoblockedindia के संचालक को आरएसएस की ओर से भेजा गया दो पन्नों का एक कथित कानूनी नोटिस मिला था। इसमें तीनों संगठनों से सरकार के कंटेंट ब्लॉक करने के आदेशों का विरोध बंद करने, प्रतिबंधित सामग्री का रिकॉर्ड रखना बंद करने और जियो-ब्लॉक की गई पोस्ट की जानकारी साझा नहीं करने को कहा गया था।
नोटिस में सात दिनों के भीतर लिखित रूप से इन मांगों का पालन करने की पुष्टि करने को कहा गया था। हालांकि, इस पर किसी व्यक्ति का नाम नहीं था और केवल ‘अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता’ के हस्ताक्षर थे। बाद में आरएसएस के कई पदाधिकारियों ने सोशल मीडिया पर इस नोटिस को प्रामाणिक मानने से इनकार किया। इसके बाद IFF ने नोटिस का जवाब दिया और 30 अक्टूबर को इसे सार्वजनिक कर दिया।
संगठन का कहना है कि 31 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस के विशेष पुलिस आयुक्त (क्राइम) ने एक्स को पहला नोटिस भेजा, जिसमें IFF और SFLC की दो पोस्ट को आरएसएस के खिलाफ मानहानिकारक बताया गया। इसके बाद 2 नवंबर को दूसरा नोटिस भेजा गया, जिसमें कुल 40 यूआरएल शामिल थे। इनमें 37 पोस्ट और तीन पूरे सोशल मीडिया अकाउंट शामिल हैं। पुलिस ने IFF, SFLC और @geoblockedindia के अकाउंट हटाने के साथ-साथ 16 अन्य यूजर्स की पोस्ट हटाने की मांग की। इन यूजर्स ने कथित कानूनी नोटिस और उससे जुड़े घटनाक्रम पर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की थी। IFF के अनुसार, दोनों नोटिस में किसी अदालत के आदेश का विवरण नहीं दिया गया है।
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताते हुए कहा कि पुलिस एक ऐसे निजी कानूनी नोटिस को लागू करने का माध्यम बन रही है, जिसकी प्रामाणिकता पर खुद आरएसएस के पदाधिकारियों ने सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि संबंधित पोस्ट में केवल उसे भेजे गए कानूनी नोटिस को सार्वजनिक किया गया है, उसकी भाषा और मांगों की आलोचना की गई है और अपने काम को जारी रखने की बात कही गई है। किसी कानूनी नोटिस को सार्वजनिक करना और उसका जवाब देना मानहानि नहीं है।
IFF ने यह भी दावा किया कि नोटिस मिलने से पहले के तीन सप्ताह में उसने 86 ऐसे लोगों की मदद की थी, जिनके सोशल मीडिया अकाउंट निलंबित किए गए थे या जिनकी पोस्ट भारत में रोकी गई थीं। वहीं, SFLC के फ्री स्पीच ट्रैकर के मुताबिक, अक्टूबर के पहले 29 दिनों में लगभग 268 कंटेंट प्रतिबंध और 83 अकाउंट प्रतिबंध दर्ज किए गए। संगठन का कहना है कि @geoblockedindia ऐसे सरकारी आदेशों को सार्वजनिक करता है, जिनके आधार पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामग्री को प्रतिबंधित किया जाता है।
कानूनी आधार पर सवाल उठाते हुए IFF ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 के तहत मानहानि का अपराध गैर-संज्ञेय और जमानती है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 174 के अनुसार, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना पुलिस गैर-संज्ञेय अपराध की जांच नहीं कर सकती। संगठन का दावा है कि दिल्ली पुलिस के नोटिस में न तो आरएसएस की ओर से दर्ज किसी शिकायत का विवरण दिया गया है और न ही मजिस्ट्रेट के किसी आदेश का उल्लेख है। IFF ने यह भी कहा कि किसी बयान को मानहानिकारक ठहराने का अधिकार अदालत का है, पुलिस अधिकारी का नहीं।
IFF ने दिल्ली पुलिस से दोनों नोटिस वापस लेने, कार्रवाई के आधार और संबंधित शिकायतों का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की है। साथ ही एक्स से अपील की है कि वह इन नोटिसों के आधार पर किसी भी अकाउंट या पोस्ट को न हटाए और यदि कोई सामग्री प्रतिबंधित की जाती है तो संबंधित यूजर को पहले इसकी पूरी जानकारी दे। संगठन ने केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और गृह मंत्रालय से भी इस मामले की समीक्षा कराने की मांग की है। IFF ने स्पष्ट किया है कि वह इंटरनेट पर सेंसरशिप से जुड़े सरकारी आदेशों का दस्तावेजीकरण और प्रभावित लोगों को कानूनी सहायता देने का काम जारी रखेगा।

