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इस्लामी विरासत कानून में बदलाव की मांग शरारतपूर्ण और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

All India Muslim Personal Law Board ने सुप्रीम कोर्ट में इस्लामी विरासत (Inheritance) कानून को अमान्य घोषित करने की मांग की कड़ी निंदा की है। बोर्ड ने कहा है कि यह मांग शरारतपूर्ण है और संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है।

बोर्ड ने एक बयान में कहा कि एक कम चर्चित संगठन Naya Nari Foundation ने Supreme Court of India में याचिका दायर कर इस्लामी विरासत कानून को मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की है, जो पूरी तरह निराधार है।

बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद क़ासिम रसूल इलियास ने कहा कि Bombay High Court के चर्चित नारसु अप्पा माली केस में स्पष्ट कहा गया था कि पर्सनल लॉ को संवैधानिक जांच के दायरे में नहीं लाया जा सकता। उन्होंने कहा कि यह दावा कि इस्लामी विरासत कानून “आवश्यक धार्मिक प्रथा” नहीं है, इस्लामी शरीयत की समझ की कमी को दर्शाता है।

डॉ. इलियास ने कहा कि इस्लाम ने पुरुष और महिला दोनों को समान सम्मान दिया है और उनके अधिकार व जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय की हैं। इस्लाम में परिवार के खर्च और भरण-पोषण की जिम्मेदारी पुरुष पर होती है, जबकि महिला पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती। इसके बावजूद महिला को विरासत में हिस्सा दिया जाता है और वह अपनी आय या विरासत को अपनी इच्छा के अनुसार खर्च कर सकती है।

उन्होंने कहा कि इस्लामी विरासत कानून में कई ऐसी स्थितियां हैं जहां महिला को पुरुष के बराबर या उससे अधिक हिस्सा मिलता है, और कुछ मामलों में सिर्फ महिलाएं ही विरासत की हकदार होती हैं। इस्लाम ने उस दौर में महिलाओं को अधिकार दिए जब उन्हें समाज में कोई विशेष दर्जा भी नहीं दिया जाता था।

बोर्ड ने यह भी कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) को समाधान बताने वाली टिप्पणियां नई नहीं हैं, लेकिन संविधान के भाग-4 के अनुच्छेद 44 में इसका उल्लेख केवल एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में किया गया है। इसे बिना सहमति के लागू करना अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से टकराएगा।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि Uttarakhand में लागू समान नागरिक संहिता को उन्होंने पहले ही अदालत में चुनौती दी है। बोर्ड ने दावा किया कि 5 करोड़ से अधिक मुसलमानों, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं, ने पहले ही Law Commission of India को ज्ञापन देकर UCC का विरोध किया था।

बोर्ड ने अंत में सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि इस्लामी विरासत कानून में बदलाव की मांग करने वाली याचिका को खारिज किया जाए।

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