सम्पादकीय

देश का हर कोना मुसलमानों के लिये तंग हो गया है, पुलिस कस्टडी में अल्ताफ़ की मौत ख़ुदकुशी नहीं, क़त्ल है

कासगंज, उत्तर-प्रदेश में पुलिस कस्टडी में 22 साल के अल्ताफ़ की मौत हो गई। पुलिस का बयान है कि उसने वाशरूम की टोंटी से लटक कर ख़ुदकुशी कर ली, ख़ुदकुशी के लिये उसने जैकेट की डोर का इस्तेमाल किया। जैकेट की डोर और तीन फ़िट ऊँची टोंटी की हैसियत देखिये और पुलिस का बयान सुनिये और अपना सर पीट लीजिये। काश! पुलिस कह देती कि मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है तो शायद सब्र भी आ जाता और लोग यक़ीन भी कर लेते, मगर क़त्ल कभी छिपता नहीं, क़ातिल कोई न कोई निशान छोड़ देता है या उसके बयान में वो शब्द होते हैं जो उसे क़ातिल साबित करने के लिये काफ़ी होते हैं।

भारत में पुलिस कस्टडी में मौतों का सिलसिला बहुत पुराना है, जब मुसलमानों का सीना सामने हो तो पुलिस की गोलियाँ अपना निशाना नहीं चूकतीं, हज़ारों घटनाएँ हैं जहाँ पुलिस ने सीधे गोली मारकर हत्याएँ की हैं, किसी ज़माने में बदनामे-ज़माना पी ए सी थी, हाशिमपुरा, मलियाना दंगों के मौक़े पर 52 मुसलमानों को सीधे गोली मारकर हिंडन नदी में बहा दिया गया था। पुलिस की तरफ़ से झूटे बयानात, ज़ोर-ज़बरदस्ती करके घरवालों से अपने बयानों पर हस्ताक्षर करवा लेना, बहुत ज़्यादा हंगामा हुआ तो कुछ सिपाहियों को ससपेंड कर देना और फिर ख़ामोशी से बहाल कर लेना, अदालतों में गवाहियों को ख़रीदना या धमकाना, हमारे देश की पहचान है।

अल्ताफ़ की मौत की घटना भी कोई आख़िरी घटना नहीं है। रोज़ाना कोई न कोई अल्ताफ़ इस तरह की घटनाओं का शिकार हो रहा है और होता रहेगा। कितने ही दिल दहला देनेवाली घटनाएँ कुछ महीनों में हुईं, मध्य-प्रदेश के इंदौर में एक चूड़ी बेचनेवाले पर हिंसा की गई, उत्तर प्रदेश में ही एक लड़के को मन्दिर में पानी पीने पर पीटा गया। दिल्ली में पहले एक फल बेचनेवाले पर और अभी हाल ही में एक बिरयानी बेचनेवाले पर ज़ुल्म किया गया। लेकिन सबसे ज़्यादा दिल दहला देनेवाली घटना कानपुर में हुई। जब पुलिस के सामने एक रिक्शा चलानेवाले को हिन्दू अतिवादी मारते रहे और उसकी मासूम बच्ची अपने बाप की टाँगों से लिपटकर बचाने की अपील करती रही।

इस तरह के दृश्यों से भी अगर पुलिस का, तमाशा देखनेवालों का या हमारा दिल नहीं पिघलता तो हमें ख़ुद को ज़िन्दा समझने, बल्कि इन्सान कहने का कोई हक़ नहीं। इसका मतलब है कि हमारे जिस्म में दिल नहीं है पत्थर है। देश हैवानों से भर गया है, जानवर भी अपने जैसे जानवरों की मदद को आगे आ जाते हैं। क्या यहाँ अम्न-पसन्दों की तादाद ख़त्म हो गई है, यूँ तो ये घटनाएँ पूरे देश में हो रही हैं, लेकिन उत्तर-प्रदेश इस तरह की घटनाओं में सबसे ऊपर है, और क्यों न हो जब क़ातिलों को सरकारी हिमायत हासिल हो, जब उन्हें जेलों में डालने के बजाय उन पर फूल मालाएँ डाली जा रही हों, जब ख़ुद प्रदेश का मुख्यमंत्री मुज़फ़्फ़रनगर दंगों को राज्य की शान बताए। इन हालात में मज़लूम क्या करें, जब देश का हर कोना उनके लिये क़त्लगाह बन गया हो?

हमारे हुक्मरानों ने ये भी सोचा है कि जब ज़ुल्म हद से बढ़ जाता है तो उसका नतीजा क्या होता है? जब फ़िरऔन का सर उठता है तो कोई न कोई मूसा का असा लेकर खड़ा हो जाता है। क्या इन्हें नहीं मालूम कि मज़लूम की चीख़ें और आहें क्या रंग दिखाती हैं? हैरत ये है कि न जनता में कोई जागरूकता है, न ख़ास लोगों में। त्रिपुरा में दंगा होता है और खुलकर ख़ून की होली खेली जाती है। इस दंगे के ख़िलाफ़ मज़लूम शान्ति-मार्च निकालते हैं तो उनपर पथराव किया जाता है, गोलियाँ बरसाई जाती हैं। यानी आप मारें भी और रोने भी न दें।

शारीरिक हिंसा के साथ मुसलमानों के एहसासात को तकलीफ़ पहुँचाकर उन्हें दिमाग़ी और मानसिक तकलीफ़ पहुँचाई जा रही है। देश का गोदी मीडिया ज़हर उगल रहा है, फासीवादी राजनीति झूट और ग़लत बयानियों से काम लेकर टॉर्चर कर रहे हैं, पुलिस जिसका काम इन्सानी जानों की रक्षा करना है, बर्बरियत पर उतर आई है। क्या देश का ज़मीर मर चुका है? हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिये कि ज़ुल्म की उम्र बहुत ज़्यादा नहीं होती। किसी भी देश की तरक़्क़ी अम्न व सलामती के पायदान पर खड़ी होती है, जिस देश की सीमाएँ असुरक्षित हों उसे अपने घर में झगड़ा नहीं करना चाहिये।

चीन लगातार हमारे देश की सीमाओं में घुसता चला जा रहा है, अरुणाचल प्रदेश में सैंकड़ों घर उसने बना लिये हैं, पाकिस्तान हमारा हमेशा का दुश्मन है, उससे किसी ख़ैर की उम्मीद बेकार है, अब हसीना भी आँखें दिखाने लगी है, नेपाल भी भरोसा खो चुका है, ऐसे में हमारे समाज में नफ़रत पर बेस्ड ये राजनीति, सरकारी संस्थाओं के ये ज़ुल्म, किसी एक क़ौम को टारगेट करके मारपीट और क़त्ल और इन पर होने वाले ज़ुल्म पर ख़ामोशी आख़िर देश को कहाँ ले जाएगी। बेरोज़गारी, ग़रीबी में बढ़ोतरी, सरकारी कम्पनियों की नीलामी, और प्राइवेटाइज़ेशन, ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी है और फासीवादी ताक़तों ने देश की नैतिक साख ख़राब कर दी है।

देश के इन हालात में ख़ैरे-उम्मत की ज़िम्मेदारी है कि वो अक़्ल और होश से काम ले। अब तज्रिबे करने का नहीं बल्कि नतीजा पैदा करनेवाले क़दम उठाने का वक़्त है। ख़ुद की कमज़ोरियाँ दूर करने का वक़्त है, फ़ुज़ूल रस्मों में पैसा और वक़्त बर्बाद करने का नहीं कुछ तामीरी काम करने का वक़्त है। आपस में गरेबानों पर हाथ डालने का नहीं, हाथ में हाथ डालकर कमज़ोरों को ऊपर उठाने का वक़्त है। मायूस होकर घर बैठ जाने का नहीं कमर कसकर मैदाने-अमल में कूद जाने का वक़्त है। सवाल हमारा नहीं बल्कि हमारी आनेवाली नस्लों का है। क्या हम इन्हें ऐसा देश छोड़कर जाएँगे जहाँ इनके पहचान की हर चीज़ मिट जाएगी? ये अहम सवाल है जिसके जवाब की ज़रूरत है।

अपनी गलियों, मोहल्लों और बस्तियों की हिफ़ाज़त की प्लानिंग कीजिये, अपने बीच अगर शर-पसन्द लोग हों तो उनके सुधार की फ़िक्र कीजिये, अपने वक़्त की प्लानिंग कीजिये, ज़ाहिर है हमारे साथ जो कुछ हो रहा है उसमें हमारी जहालत और ग़ुरबत दोनों ही शामिल हैं, इसलिये इन दोनों को दूर करने पर तवज्जोह दीजिये।

हर शख़्स को अपने मसायल ख़ुद हल करने हैं, इसलिये ख़ुद कोशिश कीजिये, ज़िम्मेदार अपनी ज़िम्मेदारी का हक़ अदा करें, लेकिन आम लोग भी अपने ज़िम्मेदारों का हाथ मज़बूत करें, अपने मक़ाम और अपनी हैसियत को पहचानिये, तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के झाँसे में मत आइये, वो आपको अपने स्टेज से धक्का दे रही हैं, आप उन्हें धुत्कार दीजिये, ख़ुद को इतना ज़लील मत कीजिये, इतना मत झुकिये कि पगड़ी ही गिर जाए। इस सर की पाकीज़गी का कुछ तो ख़याल कीजिये जो अल्लाह के आगे झुकता है। दुनिया तो ख़राब हो गई है, अब आख़िरत ही बचा लीजिये।

आख़िरी बात ये है कि अल्लाह से अपने ताल्लुक़ को मज़बूत कीजिये, अपने गुनाहों से तौबा कीजिये, उसके हुक्मों पर अमल कीजिये, आप अल्लाह के हबीब की उम्मत में हैं, अपने रसूल की इज़्ज़त और अज़मत का लिहाज़ कीजिये, उनके हुक्मों का खुले आम मज़ाक़ न बनाइये वरना अल्लाह ऐसे ही ज़ालिम हम पर मुसल्लत कर देगा जो हमारे क़त्ल को ख़ुदकुशी का नाम देंगे और हमारे क़त्ल का इलज़ाम हम पर ही लगा देंगे।

क्यों हुए क़त्ल हम पर ये इलज़ाम है,
क़त्ल जिसने किया, है वही मुद्दई,

क़ाज़ीये-वक़्त ने फ़ैसला दे दिया,
लाश को नज़रे-ज़िन्दाँ किया जाएगा,

अब अदालत में ये बहस छिड़ने को है,
ये जो क़ातिल को थोड़ी सी ज़हमत हुई,

ये जो ख़ंजर में हल्का से ख़म आ गया,
इसका तावान किससे लिया जाएगा,

(यह लेखक के अपने विचार हैं, लेखक कलीमुल हफ़ीज़ एआईएमआईएम दिल्ली के अध्यक्ष हैं)

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