चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने मंदिरों में जाति के आधार पर श्रद्धालुओं के साथ भेदभाव को लेकर अहम टिप्पणी की है। कांचीपुरम के अरुलमिगु देवराज स्वामी मंदिर में गैर-ब्राह्मण श्रद्धालुओं के साथ कथित तौर पर अलग व्यवहार किए जाने के मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि पूजा स्थलों में जातिगत भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती।
न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और ई. मनोहरन की पीठ ने माधवन बनाम आयुक्त, एचआर एंड सीई मामले की सुनवाई के दौरान कहा, “ईश्वर की दृष्टि में सभी जीव समान हैं और ईश्वर भेदभाव नहीं करता।” अदालत ने यह भी कहा कि किसी पूजा स्थल पर श्रद्धालुओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। पीठ ने भगवद्गीता के उस संदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें सभी जीवों के प्रति समान दृष्टिकोण की बात कही गई है।
यह याचिका थेंकलाई वैष्णव और थिरुकाची नांबी थिरुमलादियार सेवा संगम के सचिव माधवन रामानुज दासन ने दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि मंदिर परिसर में स्थित श्री मनवाला मामुनिगल मंदिर में गैर-ब्राह्मण श्रद्धालुओं के साथ अलग व्यवहार किया जाता है। दावा किया गया कि जहां ब्राह्मण श्रद्धालुओं को मुख्य प्रवेश द्वार से जाने की अनुमति थी, वहीं गैर-ब्राह्मणों को दूसरे प्रवेश द्वार की ओर भेजा जाता था।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि गैर-ब्राह्मण श्रद्धालुओं को तीर्थम और प्रसादम लेने के लिए मंदिर के बाहर रहना पड़ता था और उन्हें पारंपरिक रूप से दिए जाने वाला ‘सतरी’ भी नहीं दिया जाता था। इसके अलावा मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा भजन गाने पर लगाए गए कथित प्रतिबंध का मुद्दा भी अदालत के सामने उठाया गया।
हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE) और मंदिर प्रशासन ने जातिगत भेदभाव के आरोपों से इनकार किया। प्रशासन ने अदालत को बताया कि कुछ उप-मंदिर आकार में छोटे हैं और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान सभी श्रद्धालुओं के लिए वहां जगह उपलब्ध नहीं होती। अधिकारियों ने यह भी कहा कि मंदिर के कुछ सेवाधारक और अध्यापक गोष्ठी के सदस्य भी हर समय इन स्थानों में प्रवेश नहीं कर पाते।
मंदिर प्रशासन ने अदालत को आश्वासन दिया कि तीर्थम, सतरी और प्रसादम के वितरण में किसी भी वर्ग के श्रद्धालु के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। अदालत ने प्रशासन के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया।
भजन और धार्मिक पाठ के मुद्दे पर प्रशासन ने बताया कि थेंकलाई संप्रदाय से जुड़ी ‘अध्यापक मिरासी’ परंपरा के सदस्यों को कुछ विशिष्ट मंदिर अनुष्ठानों के दौरान भजन पाठ करने का कानूनी रूप से संरक्षित अधिकार प्राप्त है। इसमें पारिश्रमिक और कुछ पारंपरिक मंदिर सम्मान भी शामिल हैं।
हालांकि, प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह पारंपरिक अधिकार दूसरे श्रद्धालुओं को अपनी पूजा के हिस्से के रूप में ‘नलयिरा दिव्य प्रबंधम’ का पाठ करने से नहीं रोकता। अदालत को यह भी आश्वासन दिया गया कि किसी श्रद्धालु या समूह को मंदिर के गर्भगृह में प्रबंधम का पाठ करने से नहीं रोका जाएगा।
अदालत ने कहा कि पारंपरिक अधिकारों को जारी रखते हुए अन्य श्रद्धालुओं को भी धार्मिक पाठ में भाग लेने का अवसर दिया जा सकता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी परंपरा का पालन अपने आप में भेदभाव नहीं है, लेकिन परंपरा की आड़ में जाति के आधार पर श्रद्धालुओं के साथ असमान व्यवहार स्वीकार्य नहीं हो सकता। अदालत ने इन टिप्पणियों और मंदिर प्रशासन के आश्वासनों के बाद याचिका का निपटारा कर दिया।

