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IISER पुणे ने उमर खालिद की किताब लाइब्रेरी से हटाई, ‘अशांति’ का दिया हवाला; इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने की आलोचना

पुणे: भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), पुणे ने जेल में बंद पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद की लिखी किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ को अपनी लाइब्रेरी से हटा दिया है। संस्थान ने सोमवार को जारी बयान में कहा कि सोशल मीडिया पर किताब को लेकर उठे विवाद के बाद किसी भी गलतफहमी या अशांति से बचने के लिए एहतियातन यह फैसला लिया गया। यह किताब उमर खालिद की डॉक्टरेट रिसर्च पर आधारित है और इसमें आदिवासी इतिहास तथा सत्ता के साथ आदिवासी समुदायों के संबंधों का अध्ययन किया गया है।

यह विवाद तब शुरू हुआ, जब सोशल मीडिया मंच एक्स पर ‘जेम्स ऑफ इंडियन एकेडमिया’ नाम के एक अकाउंट ने IISER पुणे की लाइब्रेरी में नई खरीदी गई किताबों की सूची में उमर खालिद की किताब की तस्वीर साझा की। इसके बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाए कि सरकारी धन से संचालित विज्ञान संस्थान ने खालिद की किताब क्यों खरीदी। कुछ लोगों ने किताब की खरीद पर सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर भी आपत्ति जताई। सोशल मीडिया पर आलोचना के बाद संस्थान ने किताब को लाइब्रेरी से हटाने का फैसला किया।

IISER पुणे ने अपने बयान में कहा कि उसकी लाइब्रेरी में किताबें संस्थान के सदस्यों और लाइब्रेरी से संबंधित समिति की सिफारिशों के आधार पर शामिल की जाती हैं। संस्थान के मुताबिक, हर महीने विभिन्न विषयों की 50 से अधिक किताबें नियमित रूप से संग्रह में जोड़ी जाती हैं। बयान में कहा गया कि उमर खालिद की किताब का मामला अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद किसी भी गलतफहमी या अशांति से बचने के लिए इसे वापस लेने का निर्णय लिया गया। वहीं, संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के कार्यवाहक अध्यक्ष मदभुषी मदन गोपाल ने 25 अक्टूबर को एक्स पर कहा कि किताब को हटाए जाने की जानकारी मिलने के बाद संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है।

किताब की प्रस्तावना लिखने वाले इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इसे लाइब्रेरी से हटाए जाने के फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर आलोचना के कारण किसी किताब को हटाना निराशाजनक है। गुहा के मुताबिक, विज्ञान और शोध के लिए समर्पित संस्थानों को सोशल मीडिया के दबाव के बजाय अकादमिक स्वतंत्रता और खुले विचारों को महत्व देना चाहिए। किताब में झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र में आदिवासी समुदायों, राज्य की सत्ता और औपनिवेशिक शासन के ऐतिहासिक संबंधों की पड़ताल की गई है। इसमें विशेष रूप से हो आदिवासी समुदाय के इतिहास के साथ जमीन, पहचान, विस्थापन और बेदखली जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है।

उमर खालिद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं और सितंबर 2020 से दिल्ली दंगों से जुड़े कथित षड्यंत्र के मामले में जेल में बंद हैं। उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया है। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। जांच एजेंसियों ने खालिद पर कथित षड्यंत्र में भूमिका निभाने का आरोप लगाया है, जबकि उन्होंने इन आरोपों को गलत बताया है। उनकी जिस डॉक्टरेट रिसर्च पर विवादित किताब आधारित है, उसका विषय सिंहभूम क्षेत्र में आदिवासी समुदायों और सरकारी सत्ता के बीच ऐतिहासिक संबंध हैं।

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