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छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण विरोधी कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी किया है। सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए इसे उत्तर प्रदेश और राजस्थान के समान कानूनों को चुनौती देने वाली लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ने का निर्देश दिया।

यह याचिका आदिवासी ईसाइयों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन ‘इसाई आदिवासी महासभा’ की ओर से दायर की गई है। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने बल, धोखाधड़ी, गलत जानकारी या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण रोकने के उद्देश्य से यह कानून पारित किया था। हालांकि, नागरिक अधिकार संगठनों ने इसके प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इनसे व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने अदालत को बताया कि उत्तर प्रदेश और राजस्थान के इसी तरह के कानूनों को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि छत्तीसगढ़ के कानून से संबंधित एक याचिका राज्य के हाईकोर्ट में लंबित है। इस पर उन्होंने संबंधित याचिकाकर्ताओं से परामर्श के बाद मामले को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कराने के लिए याचिका दायर करने की संभावना पर विचार करने की बात कही।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा गया है कि धर्म चुनने की स्वतंत्रता व्यक्ति की निजता, स्वायत्तता और धार्मिक आजादी से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकार है। याचिकाकर्ताओं ने कानून की धारा 2(1)(क) के प्रावधान पर भी आपत्ति जताई है, जिसके तहत बेहतर जीवनशैली का वादा करना या किसी धर्म की दूसरे धर्म के मुकाबले प्रशंसा करना भी प्रलोभन की श्रेणी में आ सकता है। याचिका के मुताबिक, इस तरह की व्यापक परिभाषा से सामान्य धार्मिक प्रचार, धार्मिक शिक्षाओं की व्याख्या और परोपकारी कार्यों को भी अपराध के दायरे में लाए जाने का खतरा है।

याचिका में धर्म परिवर्तन से पहले और बाद में घोषणा करने की अनिवार्यता को भी चुनौती दी गई है। कानून के तहत धर्म परिवर्तन करने के इच्छुक व्यक्ति को अपना नाम, वर्तमान धर्म और प्रस्तावित धर्म की जानकारी सार्वजनिक करनी होती है। धर्म परिवर्तन के बाद 30 दिनों के भीतर नई घोषणा जमा करना और 21 दिनों के भीतर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना भी आवश्यक है। इन शर्तों का पालन नहीं करने पर धर्म परिवर्तन को अवैध माना जा सकता है। कानून में कम से कम सात साल की कैद का प्रावधान है, जबकि धर्मांतरित व्यक्ति के नाबालिग, महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होने पर सजा बढ़ाकर दस साल तक की जा सकती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ऐसे प्रावधान धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को अत्यधिक नियंत्रित और सार्वजनिक निगरानी के अधीन बना देते हैं। सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले पर आगे की सुनवाई के दौरान कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़े सवालों पर विचार किया जाएगा।

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