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लोग कोरोना से मर रहे हैं, PM पुरस्कार बांट रहे हैं! रवीश कुमार बोले “ये काम कोई और नहीं कर सकता था?”

कोरोना वायरस जंगल में लगी आग की तरह पूरे देश में फैल रहा है। कोरोना महामारी की दूसरी लहार ने पूरे देश को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। ऐसे में आम जनमानस में दहशत का माहौल है।

देश के तमाम अस्पताल ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा है। लोग ऑक्सीजन की कमी से तड़प तड़प कर मर रहे हैं। मैक्स, अपॉलो समेत देश के तमाम बड़े बड़े अस्पतालों ने अपने यहां ऑक्सीजन की भारी कमी बताई है। सभी अस्पतालों ने ऑक्सीजन के लिए सरकार से मदद की गुहार भी लगाई थी। लेकिन कोई मदद नहीं मिलने के कारण अस्पतालों ने कोर्ट का रूख किया है।

इस भारी संकट में भी सरकार का ढीला रवैया काफी हैरान करने वाला है। इस समय पूरी सरकारी मशीनरी को ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए जुट जाना चाहिए था किंतु सरकार का पूरा मंत्रिमंडल बंगाल चुनाव जीतने में लगा है।

एक तरफ जहां विपक्ष के सभी नेताओं ने अपनी रैलियों को स्थगित कर दिया है वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने आज भी वर्चुअल रैली किया।

प्रधानमंत्री मोदी को कोरोना के प्रति लचर रवैये से पूरा देश चिंतित है और उनसे सवाल कर रहा है कि आखिर लोगों की जान इतनी सस्ती क्यूँ है?

आज पंचायती राज दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए से एक प्रोग्राम को संबोधित किया। साथ ही प्रधानमंत्री ने इस मौके पर कई पुरस्कारों के भी ऐलान किया।

देश को ऑक्सीजन बांटने की जगह प्रधानमंत्री पुरस्कार बांट रहे हैं। जबकि ये काम कोई और भी कर सकता था।
क्या प्रधानमंत्री को लोगों की जान से ज़्यादा लोकप्रियता प्यारी हैं?

प्रधानमंत्री के इस गैरज़िम्मेदाराना रवैये की चौतरफा आलोचना हो रही है। तमाम बुद्धिजीवी वर्ग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ये सवाल कर रहा है कि आखिर आपकी प्रार्थमिकता क्या है?

NDTV के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने फ़ेसबुक पोस्ट के माध्यम से प्रधानमंत्री जी से सवाल किया है कि “क्या प्रधानमंत्री जी, लोग मर रहे हैं आप पुरस्कार बाँट रहे हैं ?
ये काम कोई और नहीं कर सकता था ? मतलब.. . क्या कहा जाए ।

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=298943224929931&id=100044427669637

आपको बता दें कि पिछले 24 घंटे में साढ़े तीन लाख से ज़्यादा लोग कोरोना की चपेट में आचुके हैं। और 2000 से ज़्यादा लोग मर चुके हैं।

ये तो खैर सरकारी आंकड़ा है। अगर हम रिपोर्ट्स की माने तो ये आंकड़ा हक़ीक़त से बहुत कम है। रिपोर्ट्स की माने तो ये आंकड़ा सरकारी आंकड़े से 10 गुणा ज़्यादा हो सकता है।

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