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“कॉकरोच” और “परजीवी” टिप्पणी पर मनोज कुमार झा का खुला पत्र, न्यायपालिका की भाषा पर उठाए सवाल

राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने देश के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र लिखा है जिसमें हालिया टिप्पणियों पर गंभीर आपत्ति जताई है। पत्र में उन्होंने “कॉकरोच” और “परजीवी” जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक गरिमा के खिलाफ बताया।

मनोज कुमार झा ने कहा कि जब देश के मुख्य न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और असहमति रखने वालों के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो यह केवल शब्दों का विवाद नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को प्रभावित करता है।

उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि भारत के करोड़ों बेरोज़गार युवा पहले ही आर्थिक संकट, भर्ती में देरी, पेपर लीक और अस्थायी नौकरियों जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में उन्हें “परजीवी” कहना उनकी पीड़ा और संघर्ष का अपमान है।

आरटीआई कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सूचना के अधिकार और खोजी पत्रकारिता ने लोकतंत्र को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। कई कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए अपनी जान तक गंवाई है। ऐसे लोगों को संदेह की नजर से देखना लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर करता है।

मनोज कुमार झा ने यह भी कहा कि न्यायपालिका से हमेशा संयम, संवेदनशीलता और संवैधानिक नैतिकता की उम्मीद की जाती है। उनके अनुसार अदालतों का दायित्व असहमति की आवाज़ों की रक्षा करना है, न कि उन्हें अपमानित करना।

अपने पत्र के अंत में उन्होंने लिखा कि बेरोज़गार युवा, स्वतंत्र पत्रकार, आरटीआई कार्यकर्ता और सवाल पूछने वाले नागरिक लोकतंत्र के “कीड़े-मकोड़े” नहीं, बल्कि उसकी जीवंत आवाज़ें हैं।

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