कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने भारत में मुसलमानों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव और सामाजिक अलगाव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। एक लेख साझा करते हुए थरूर ने कहा कि जब किसी समुदाय के लोग अपने ही देश में खुद को असुरक्षित या बहिष्कृत महसूस करने लगें, तो यह समाज की सामूहिक नैतिक विफलता का संकेत है।
थरूर ने महाराष्ट्र में भाजपा के जम्मू-कश्मीर मीडिया सह-प्रभारी सज्जाद यूसुफ शाह के साथ कथित भेदभाव की घटना का जिक्र किया। शाह का आरोप है कि औरंगाबाद के एक होटल में उन्हें मुस्लिम और कश्मीरी होने के कारण कमरा देने से इनकार कर दिया गया। थरूर ने कहा कि यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि समाज में बढ़ते पूर्वाग्रह की एक चिंताजनक मिसाल है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि किसी देश की महानता केवल उसकी आर्थिक प्रगति, राजमार्गों या रक्षा क्षमता से नहीं आंकी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। उन्होंने कहा कि जब नागरिकों का एक वर्ग खुद को व्यवस्था से अलग-थलग महसूस करता है, तो सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता दोनों कमजोर पड़ जाते हैं।
भाजपा का नाम सीधे तौर पर लिए बिना थरूर ने कहा कि लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति ने समाज में अविश्वास को बढ़ावा दिया है। उन्होंने कहा कि जब भेदभाव सामान्य और संस्थागत रूप लेने लगता है, तो वह राजनीतिक विचारधारा नहीं बल्कि व्यक्ति की पहचान को निशाना बनाने लगता है।
थरूर ने भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति और “अतिथि देवो भव” की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को अपनी समावेशी विरासत को फिर से मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान के कारण खुद को अपने ही देश में पराया महसूस करने लगें, तो यह भारत के सामाजिक ताने-बाने और साझा नागरिकता की भावना के लिए गंभीर खतरा होगा।

