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बाबरी मस्जिद का विध्वंस अचानक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश थी: न्यायमूर्ति एम.एस. लिबरहान का निधन

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की जांच के लिए गठित लिबरहान आयोग के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एस. लिबरहान का 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

उन्हें मुख्य रूप से उस आयोग का नेतृत्व करने के लिए याद किया जाता है, जिसने अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला था कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस अचानक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम था।

केंद्र सरकार ने 16 दिसंबर 1992 को, बाबरी मस्जिद विध्वंस के दस दिन बाद, न्यायमूर्ति लिबरहान की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया था। शुरुआत में आयोग को तीन महीने में रिपोर्ट देने का कार्य सौंपा गया था, लेकिन जांच 17 वर्षों तक चली।

इस दौरान आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया और लगभग 100 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। 30 जून 2009 को आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी।

लिबरहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस स्वतःस्फूर्त घटना नहीं थी, बल्कि इसकी पहले से विस्तृत योजना बनाई गई थी। रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), भारतीय जनता पार्टी (BJP), विश्व हिंदू परिषद (VHP), बजरंग दल और शिवसेना के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की भूमिका का उल्लेख किया गया था।

आयोग ने कहा था कि कारसेवकों की संगठित गतिविधियां, विध्वंस के लिए आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता और घटनास्थल पर की गई तैयारियां इस बात का संकेत देती हैं कि पूरी कार्रवाई पूर्व नियोजित थी।

रिपोर्ट में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल और अन्य नेताओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए थे।

हालांकि वर्ष 2020 में सीबीआई की विशेष अदालत ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, लेकिन न्यायमूर्ति लिबरहान अपने निष्कर्षों पर कायम रहे और सार्वजनिक रूप से कहते रहे कि उपलब्ध साक्ष्य एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करते हैं।

11 नवंबर 1938 को जन्मे न्यायमूर्ति एम.एस. लिबरहान ने अपने न्यायिक जीवन में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और बाद में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दीं।

कानूनी क्षेत्र में उनकी ईमानदारी, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के लिए उन्हें व्यापक सम्मान मिला। उनके निधन पर कई राजनीतिक और सामाजिक नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की है।

एनसीपी (शरद पवार) के प्रवक्ता रविकांत वर्पे ने कहा कि लिबरहान आयोग की रिपोर्ट भारतीय राजनीति, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर होने वाली बहस का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बनी रहेगी और न्यायमूर्ति लिबरहान को सत्य, न्याय और संविधान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

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