छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के कई आदिवासी ईसाई परिवारों ने आरोप लगाया है कि उन्हें लगातार धमकियों, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। परिवारों का कहना है कि उन पर हिंदू धर्म अपनाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और इनकार करने पर उन्हें गांव छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
मकतूब मीडिया कि रिपोर्ट के मुताबिक, बस्तर जिले के बड़ेपरोदा गांव के निवासी गोविंद मांडवी ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2017 में अपने परिवार और अन्य कई परिवारों के साथ अपनी इच्छा से ईसाई धर्म अपनाया था। उनका कहना है कि शुरुआती वर्षों में कोई बड़ी समस्या नहीं थी, लेकिन पिछले दो वर्षों में हालात काफी खराब हो गए हैं।
मांडवी के अनुसार, 2024 में उन्हें और कई अन्य परिवारों को कथित तौर पर धमकियों और हमलों के कारण अपना गांव छोड़ना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने उनकी पिटाई की, जिससे वे घायल हो गए। उनका कहना है कि उनसे बार-बार “घर वापसी” कर हिंदू धर्म अपनाने की मांग की गई, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
पीड़ित परिवारों का आरोप है कि धर्म परिवर्तन से इनकार करने पर उन्हें सामुदायिक सुविधाओं से भी वंचित किया गया। उनका कहना है कि उनके पानी के स्रोतों को नुकसान पहुंचाया गया और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। कई परिवारों ने डर और दबाव के कारण अपना धर्म बदल लिया, जबकि कुछ परिवार गांव छोड़कर दूसरे स्थानों पर रहने को मजबूर हो गए।
मानवाधिकार संगठनों और ईसाई समुदाय से जुड़े समूहों ने भी छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और भेदभाव पर चिंता जताई है। विभिन्न रिपोर्टों में दावा किया गया है कि कई गांवों में ईसाई परिवारों को पानी, रोजगार और अन्य सामुदायिक सुविधाओं तक पहुंच से रोका गया है।
पीड़ित परिवारों का यह भी आरोप है कि शिकायतों के बावजूद पुलिस ने पर्याप्त कार्रवाई नहीं की। गोविंद मांडवी का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन और पुलिस से मदद की गुहार लगाई, लेकिन उन्हें अपेक्षित सुरक्षा नहीं मिली। हालांकि, कुछ मामलों में अदालत के हस्तक्षेप के बाद एफआईआर दर्ज की गई और कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं।
परिवारों का कहना है कि उन्हें अपनी पैतृक जमीन और घर छोड़ने का दर्द आज भी महसूस होता है। मांडवी ने कहा कि वे केवल अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीना चाहते हैं और किसी भी तरह का जबरन धर्म परिवर्तन स्वीकार नहीं करेंगे।
मामले में पुलिस और प्रशासन की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे अब भी न्याय और सुरक्षा की उम्मीद में इंतजार कर रहे हैं।

