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कांग्रेस ने मौलाना बदरुद्दीन अजमल को अपने गठबंधन में शामिल नहीं करके यह बता दिया कि उनको केवल मुसलमानों के वोट चाहिए, उनकी हिस्सेदारी नहीं: शम्स तबरेज कासमी

मौलाना बदरुद्दीन अजमल की AIUDF आसाम की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है, साल 2011 के चुनाव में यह वहां की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी कांग्रेस सत्ता में थी और यह विपक्ष में।

2014 के लोकसभा इलेक्शन में असम की 14 लोकसभा सीटों में से 3 पर AIUDF को जीत मिली थी और कांग्रेस भी वहां केवल 3 सीट पर ही जीत मिली थी. 2016 में जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई तब उनको AIUDF की ताकत का एहसास हुआ और 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन करने का ऐलान किया, गठबंधन की पूरी तैयारी हो चुकी थी सीटों का बंटवारा भी हो चुका था लेकिन आखरी टाइम पर कांग्रेस ने धोखा देते हुए इंकार कर दिया।

2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल से बात कर गठबंधन का प्रयास किया और उन्होंने लोक सभा इलेक्शन में मिले धोखा को भूलकर हाथ मिला लिया मकसद था वोटों के बटवारा को रोकना और बीजेपी को सत्ता से बाहर करना लेकिन हिंदू बहुसंख्यक इलाका अपर आसाम में कांग्रेस को 46 में से सिर्फ 4 सीटों पर जीत मिली और बीजेपी दोबारा सत्ता में वापस आ गई।

अगले वर्ष राज्यसभा के चुनाव में कांग्रेस के कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग करके बीजेपी को फायदा पहुंचाया और एआईयूडीएफ ने असम कांग्रेस के विधायकों की गद्दारी का जब पर्दाफाश किया और सवाल उठाया तो कांग्रेस ने मौलाना अजमल पर ही बीजेपी की बी टीम होने का इल्जाम लगा दिया और गठबंधन खत्म कर लिया दूसरी तरफ चुपके से कांग्रेस ने अपनों ने विधायकों के खिलाफ मामूली कार्रवाई भी की।

असम में कांग्रेस ने अब बीजेपी के खिलाफ चुप्पी साधे हुई है और केवल बदरुद्दीन अजमल का विरोध कर रही है, पिछले दिनों मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा का एक कम्युनल बयान आया जिसका कांग्रेस ने विरोध नहीं किया और जब मौलाना अजमल की तरफ से उसका विरोध हुआ तो कांग्रेस उल्टा मौलाना अजमल की गिरफ्तारी का मांग करने लगी यह कहकर कि बदरुद्दीन अजमल ने CM को जवाब देकर हिंदुओं की भावना आहत की है।

अब 2024 के लिए बनाए गए विपक्षी दलों के INDIA में भी AIUDF को कांग्रेस ने जगह नहीं दी है, पिछले 12 जून को जब पटना में मीटिंग हुई थी तो उसमें नीतीश कुमार ने मौलाना को न्योता दिया था, नीतीश कुमार ने दूसरी पार्टियों के लीडरों के साथ मौलाना बदरुद्दीन अजमल से भी पटना में मुलाकात की थी लालू यादव प्रसाद भी उनके साथ थे लेकिन इस बार कांग्रेसी ने उनको शामिल करने से इंकार कर दिया। विपक्षी दलों ने 26 पार्टियों का जो INDIA बनाया है उसमें 10 से ज्यादा पार्टियां ऐसी है जिसके पास लोकसभा में एक भी एमपी नहीं है और ना कभी जीत मिली है विधानसभा में भी कई पार्टियों के पास एमएलए नहीं है।

सवाल यह है कि ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को इस गठबंधन का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया, मौलाना बदरुद्दीन अजमल पर कम्युनल सियासत का इल्जाम भी नहीं है, इनकी पार्टी के नाम में भी कोई ऐसा शब्द नहीं है जिससे यह पता चले कि किसी खास धर्म की सियासत होती है।

एआईयूडीएफ के टिकट पर हिंदू और मुसलमान दोनों चुनाव लड़ते हैं , 2014 में करीमगंज लोकसभा से हिंदू समाज के उम्मीदवार को मौलाना की पार्टी से जीत मिली थी।

असम की एक सच्चाई यह भी है कि कांग्रेस ने अपनी सरकार रहते हुए मुसलमानों के लिए जितना काम वहां किया उससे ज्यादा मौलाना अजमल ने अपनी संस्था द्वारा काम किया है , 26 से ज्यादा कॉलेज बनाया 40 से ज्यादा स्कूल कायम किया।

अजमल सुपर 40 में NEET, JEE और UPSC की तैयारी कराई जाती है, हर साल इन इलाकों में लाखों गरीब यतीम बच्चे पढ़ते हैं, हर साल वहां बाढ़ से तबाही मचती है और मौलाना के संस्था और पार्टी मदद के लिए पहुंचती है।

कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को यह बताना होगा कि उन्होंने मौलाना बदरुद्दीन अजमल को अपने गठबंधन में शामिल क्यों नहीं किया, क्या उनको मुसलमानों का केवल वोट चाहिए उनकी हिस्सेदारी नहीं, बदरुद्दीन अजमल की पार्टी से आख़िर उनको प्रॉब्लम क्या है?

(यह लेख शम्स तबरेज कासमी ने लिखा हैं, लेखक मिल्लत टाइम्स न्यूज़ वेबसाईट के फाउंडर हैं)

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