देशभर के 250 से अधिक नागरिक समाज के सदस्यों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पूर्व न्यायाधीशों और शिक्षाविदों ने मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) को लेकर गंभीर चिंता जताई है। एक संयुक्त बयान जारी कर उन्होंने इस प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग की है और चुनाव आयोग पर सत्ताधारी दल के साथ “राजनीतिक रूप से संरेखित” होने का आरोप लगाया है।
बयान के अनुसार, जून 2025 से अब तक 13 राज्यों में लागू एसआईआर प्रक्रिया के कारण लगभग 6.5 करोड़ वैध मतदाता अपने मतदान अधिकार से वंचित हो चुके हैं। इसे हस्ताक्षरकर्ताओं ने “असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक, गैर-पारदर्शी और अवैज्ञानिक” करार दिया है।
इस संयुक्त बयान का समन्वय कर्नाटक के तारा राव, एपीसीआर के नदीम खान और झारखंड जनाधिकार महासभा के मंथन ने किया। इस पर पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी, राजनीतिक विश्लेषक परकला प्रभाकर, एमकेएसएस के निखिल डे, योगेंद्र यादव, विधायक जिग्नेश मेवानी, अभिनेता प्रकाश राज और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सेतलवाड सहित कई प्रमुख हस्तियों ने हस्ताक्षर किए।
बयान में पश्चिम बंगाल का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा गया कि वहां एसआईआर के दौरान करीब 35 लाख मतदाताओं को सत्यापन प्रक्रिया से वंचित कर दिया गया, जिसके कारण वे मतदान अधिकार खो बैठे। इसे “बुनियादी अधिकारों से बड़े पैमाने पर वंचित करने” का उदाहरण बताया गया है।
हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया का सबसे अधिक असर महिलाओं, प्रवासी मजदूरों, खानाबदोश समुदायों, आदिवासियों, दलितों और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ा है।
उनका आरोप है कि यह कोई संयोग नहीं बल्कि देश की सामाजिक संरचना को प्रभावित करने की कोशिश है।
संयुक्त बयान में चुनाव आयोग द्वारा “घुसपैठियों की पहचान” के नाम पर दिए गए तर्क को भी खारिज करते हुए कहा गया कि एसआईआर अपने घोषित उद्देश्य में पूरी तरह विफल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए बयान में कहा गया कि अदालत अब तक नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने मांग की है कि एसआईआर की संवैधानिक वैधता पर फैसला आने तक चुनाव प्रक्रिया आगे न बढ़ाई जाए तथा सभी राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया तुरंत रोकी जाए।
अब तक हुए संशोधनों की स्वतंत्र और गहन समीक्षा हो
पारदर्शी नियम और कड़े ऑडिट प्रावधान लागू किए जाएं, सुप्रीम कोर्ट पहले एसआईआर की वैधता पर फैसला दे, वर्तमान चुनाव आयोग को हटाकर संसदीय निगरानी में नया आयोग नियुक्त किया जाए।
बयान में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो देशभर में व्यापक विरोध देखने को मिल सकता है। साथ ही आरोप लगाया गया कि कुछ राज्यों में चुनाव परिणामों में हेरफेर की आशंका है।
अंत में नागरिक समाज समूहों ने कहा कि चुनाव आयोग का रवैया संविधान और लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

