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सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के 350 से अधिक मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के 350 से अधिक मदरसा शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियमितीकरण और सरकारी वेतन की मांग संबंधी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

याचिकाकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल सरकार की अनुदान सहायता (ग्रांट-इन-एड) योजना के तहत अपनी नियुक्तियों को मान्यता देने और वेतन भुगतान का आदेश देने की मांग की थी।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने कहा कि याचिकाओं में कोई कानूनी आधार नहीं पाया गया। अदालत ने बताया कि 350 से अधिक याचिकाकर्ताओं में से 13 मामलों की विस्तार से जांच की गई थी।

पीठ ने कहा कि यदि इन 13 में से कोई भी अपना दावा साबित कर देता, तो अन्य मामलों पर भी विचार किया जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया गया।

यह मामला पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008 से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद भी उनकी नियुक्तियां विधिसम्मत तरीके से हुई थीं।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2020 में एस.के. मोहम्मद रफीक बनाम प्रबंध समिति, कोंटाई रहमानिया हाई मदरसा मामले में इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था।

इसके बाद नियुक्तियों को लेकर दायर अवमानना याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2023 में एक समिति गठित की थी, जिसने संबंधित नियुक्तियों की जांच के बाद अधिकांश दावों को स्वीकार नहीं किया।

समिति की रिपोर्ट को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत नई रिट याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी जांच की कि संबंधित मदरसों को नियुक्ति के समय पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड की मान्यता प्राप्त थी या नहीं तथा उनकी प्रबंधन समितियां नियमों के अनुरूप गठित और अनुमोदित थीं या नहीं। इन पहलुओं पर याचिकाकर्ता अदालत को संतुष्ट नहीं कर सके।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल में मदरसों की मान्यता, वित्तीय सहायता और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सरकारी स्तर पर कई नीतिगत बदलाव किए जा रहे हैं। इन कदमों को लेकर राज्य में राजनीतिक और सामाजिक बहस भी जारी है।

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