नई दिल्ली। विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को 2029 से पहले पूरे देश में लागू करने की मांग की है। वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि यूसीसी को मुस्लिम विरोधी कानून के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनका दावा है कि इसका उद्देश्य विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार जैसे नागरिक मामलों में समानता और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना है।
आलोक कुमार का यह बयान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के एक दिन बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए 2029 तक अपने सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करेगा। वीएचपी नेता ने कहा कि जिन राज्यों में सरकार के पास मजबूत बहुमत है, उन्हें यूसीसी से संबंधित कानून पारित करने में ज्यादा कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
आलोक कुमार ने कहा कि देश का शासन शरिया कानून के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान में निहित समानता के मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने यूसीसी के विरोध पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसकी व्यापक अवधारणा के बजाय बहस अक्सर मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों पर इसके संभावित प्रभाव तक सीमित रह जाती है।
वीएचपी नेता के मुताबिक, समान नागरिक संहिता का उद्देश्य नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है, ताकि सभी नागरिकों को समान अधिकार मिल सकें। यूसीसी के समर्थकों का तर्क है कि इससे विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता को मजबूती मिलेगी। वहीं, इसके विरोधी धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं और विभिन्न समुदायों को मिले संवैधानिक संरक्षण को लेकर चिंता जताते रहे हैं।
आलोक कुमार ने भाजपा शासित अन्य राज्यों से भी यूसीसी लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की। उन्होंने उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य पहले ही समान नागरिक संहिता लागू कर चुका है और अन्य राज्यों के लिए यह एक उदाहरण है।
गौरतलब है कि यूसीसी लंबे समय से भाजपा और हिंदुत्व संगठनों के प्रमुख वैचारिक मुद्दों में शामिल रहा है। राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद समान नागरिक संहिता को भाजपा की प्रमुख राजनीतिक एवं विधायी प्राथमिकताओं में गिना जाता है। वीएचपी की यह मांग ऐसे समय सामने आई है जब 2029 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले होने वाले विभिन्न विधानसभा चुनावों को देखते हुए यूसीसी को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है।

