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AIMIM-बहुजन संस्कृति मंच के बैनर तले दलित मुस्लिम इत्तेहाद पर कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ

ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने दलित-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए कवि सम्मेलन का आयोजन किया।

कवि सम्मेलन का आयोजन ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन दिल्ली की सोशल एंड कल्चरल विंग और बहू जन संस्कृति मंच के बैनर तले होटल रिवर व्यू में हुआ।

कवि सम्मेलन में मौजूद वक्ताओं ने कहा कि भारत में हमेशा एक वर्ग वह रहा है जिसको यहां के हुक्मरानों ने अछूत बना कर रखा है. उसकी असल वजह सनातन धर्म की भेदभाव पर आधारित शिक्षाएं हैं. लेकिन अफ़सोस है कि मुस्लिम हुक्मरानों भी इस वर्ग के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए. इसलिए आज तक दलित ही बना हुआ है।

देश के आने वाले हालात पिछड़े वर्गों के लिए बहुत ज़्यादा तक़लीफ़ देह साबित होंगे. अगर देश के हालात बदलने हैं तो दलित और मुसलमानों को इख़लास के साथ एकजुट होना होगा।

सिंपोजियम की अध्यक्षता कर रहे सिद्धार्थ पब्लिकेशन और गौतम बुक सेंटर के बानी और चेयरमैन दलित साहित्य रिसर्च फाउंडेशन सुल्तान सिंह गौतम ने कहा कि दलित मुस्लिम एकता वक़्त की ज़रूरत है।

देश में लोकतंत्र की जगह फ़ासिज़्म ने ले ली है. इसलिए देश के तमाम पिछड़े और मज़लूम क़ौम को एक हो जाना चाहिए. इस इत्तेहाद में धर्म को रुकावट नहीं बनना चाहिए।

ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन दिल्ली के अध्यक्ष कलीमुल हफ़ीज़ ने कहा कि किसी भी क़ौम की तरक़्क़ी के लिए राजनीतिक एंपावरमेंट ज़रूरी है बग़ैर उसके कोई मसला हल नहीं होने वाला है. अगर चे दलितों की सियासी पार्टी मौजूद है लेकिन इस पार्टी ने भी अपने फ़ायदे के लिए उन पार्टियों से गठबंधन किया जो दलितों के पिछड़ेपन की ज़िम्मेदार है।

मुसलमानों के यहां कम से कम दलितों से भेदभाव का वह मामला नहीं है जो सनातन धर्म में है और मौजूदा सरकार की पॉलिसियों से दोनों वर्गों पर असर पड़ता है. इसलिए हम दोनों का दर्द एक है. और जब दर्द एक हो तो एक दूसरे के हमदर्द बन जाते हैं।

मजलिस हमेशा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का एहतराम भी करती है. और एहसानमंद भी है कि उन्होंने मुसलमानों को मायूस नहीं किया।

महाना समयक भारत के एडिटर के पी मौर्या ने कहा कि दलितों के पिछड़ेपन की असल वजह उनको आबादी के अनुसार हिस्सेदारी न मिलना है. अगर चे संविधान में दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए उनके अधिकारों की ज़मानते मौजूद हैं. लेकिन हुक्मरानों का ताल्लुक उच्च जाति और स्वर्ण से होने की वजह से अधिकारों पर डाका डाला जाता रहा है।

आज दलित मुस्लिम इत्तेहाद की जो कोशिश हो रही है वह बहुत पहले होनी चाहिए थी फिर भी मैं इसका ख़ैर मक़दम करता हूं।

जस्टिस ओ पी शुक्ला ने कहा कि बाबा साहब और दलित महापुरुषों का मुसलमानों ने हमेशा साथ दिया है. इसलिए मैं समझता हूं कि दलितों को भी इस वक्त मुसलमानों के साथ खड़े होना चाहिए।

सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रकांता सिवाल ने कहा कि मुसलमानों और दलितों के मसले एक जैसे हैं दोनों जगह ज़हालत और गुरबत है. दोनों को असुरक्षा का एहसास है. उसकी एक बड़ी वजह दोनों वर्गों की औरतों का अनपढ़ होना है. अभी वक्त यह है कि हम सब लोग अपनी बेटियों और महिलाओं को तालीम दें. जब किसी क़ौम महिलाएं पढ़ जाती हैं तो वह कौम अपने अधिकारों की सुरक्षा कर सकती है।

लॉर्ड बुद्धा ट्रस्ट के चेयरमैन अमर बसारत ने कहा कि दलित और मुसलमानों की आबादी तक़रीबन बराबर है. अगर यह दोनों कम्युनिटी एक साथ आ जाएं तो देश पर हुकुमरानी करें मगर यह तभी मुमकिन है जब दोनों क़ौमें अपने निजी फ़ायदे की क़ुर्बानी दे और सामाजिक तौर पर भी दूरियां खत्म करें सिर्फ वोटों की हद तक इत्तेहाद हुकूमत तो ला सकता है मगर सच्ची खुशी और खुशहाली नहीं ला सकता।

इन के अलावा शंभू कुमार, संपादक नेशनल दस्तक, केसी आर्य अध्यक्ष दिल्ली जन मंच, मजलिस नेता मुहम्मद इस्लाम ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

सिंपोजियम के बाद कवि सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें ,एजाज अंसारी जगदीश जेंदर, अब्दुल ग़फ़्फ़ार दानिश ,संतोष पटेल, सोनिया कंवल, जावेद सिद्दीक़ी, इंद्रजीत शिव कुमार, कीर्ति रतन, अनस फैजी और सुंदर सिंह ने अपने कलाम से श्रोताओं को नवाज़ा इस मौक़े पर समस्त शायरों को फातिमा शेख़ अवार्ड से नवाजा गया।

सुल्तान सिंह गौतम और कलीमुल हफ़ीज़ को कांशीराम साहित्य रत्न अवार्ड , जस्टिस ओ पी सिंह व बाकी वक्ताओं को बहुजन रत्न अवार्ड से सम्मानित किया गया।

सिंपोजियम की अध्यक्षता एम आई एम दिल्ली के संगठन सचिव अब्दुल गफ्फार सिद्दीकी और मुशायरे की अध्यक्षता मशहूर शायर और बहुजन संस्कृति मंच के अध्यक्ष राजीव रियाज़ प्रतापगढ़ी ने की।

दलित समाज के 100 से ज्यादा बुद्धिजीवियों और मजलिस के अहम जिम्मेदारों ने प्रोग्राम में शिरकत की प्रोग्राम के आगाज में वक्ताओं और शायरों का फूल मालाओं से स्वागत किया गया

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