सम्पादकीय

आज़ादी के बाद भारत में मुसलमान सियासी ताक़त क्यों नहीं बन सके?

भारत में मुसलमान लगभग एक हज़ार साल से आबाद हैं। लम्बे समय तक वो शासक रहे। इसके बावजूद उनकी सियासी सूझबूझ और सियासी समझ पक्की नहीं है। भारत में वो सियासी तौर पर कोई ताक़त नहीं बन सके। कोशिशें हुईं, लेकिन नाकाम हो गईं। लीडर्स उठे, मगर अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला। कुछ तहरीकें बहुत ज़ोर-शोर से उठीं लेकिन साबुन के झाग साबित हुईं।

अब भी कोशिशें हो रही हैं, लेकिन उम्मीद का सूरज निकलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। जबकि हर पार्टी, जमात और हर गरोह इसकी ज़रूरत गुज़रते वक़्त के साथ शिद्दत से महसूस करता रहा है। अपने-आपको मिल्लत का सेवक समझनेवाला हर व्यक्ति फ़िक्रमंद है। हर चेहरे पर फ़िक्र के आसार हैं। फिर क्या वजह है कि मुसलमान सियासी हैसियत में पहले से ज़्यादा बे-वज़्न हो गए हैं? मेरी राय में इसकी कुछ वजहें हैं।

सबसे पहली वजह ये है कि भारत का आम मुसलमान कभी सियासी नहीं रहा। मुस्लिम बादशाहों के ज़माने में भी आम मुसलमान का ताल्लुक़ सल्तनत के सियासी मामलों से बिलकुल भी नहीं था। बादशाहत, सल्तनत और पूरा राज्य कुछ एक क़बीलों और ख़ानदानों तक महदूद थी। उसी के लोग अपनी सियासी चालें चलते थे, वही आपस में बादशाह बनने या बादशाह को बेदख़ल करने की साज़िशें करते थे। बादशाह की अपने साम्राज्य को फैलाने की फ़िक्र उसे आसपास के राज्यों पर कभी हमला करने के लिये उकसाती या कभी डिफ़ेंसिव जंग पर मजबूर करती, बादशाह का ज़्यादा वक़्त मैदाने-जंग की नज़र हो जाता या अपनों से अपनी और अपने राज्य की हिफ़ाज़त में गुज़र जाता।

कोई वोटिंग सिस्टम नहीं था। देश में बादशाहत थी, राज्यों में नवाब थे, इलाक़ों में ज़मींदार थे। आम जनता को सियासी मामलों में न दिलचस्पी थी और न ये उनकी ज़रूरत थी। ब्रिटिश राज में भी यही सिस्टम क़ायम रहा। सियासत में केवल हाकिम बदलते थे, बाक़ी सब कुछ जैसे चल रहा था वैसे ही था, अलबत्ता तालीम की बहुतायत और सइंसी तरक़्क़ी ने आम लोगों को हालात से बाख़बर ज़रूर कर दिया था।

दूसरी वजह ये रही कि आज़ादी के बाद मुसलमानों का वो तबक़ा जिसके पास इल्म भी था और किसी हद तक उनका सियासी शुऊर भी बेदार हो चुका था, देश के बँटवारे के नतीजे में पाकिस्तान चला गया। इस तरह भारतीय मुसलमान अपने अच्छे और समझदार लोगों से महरूम हो गए।

तीसरी वजह मुसलमानों में दीन के सही तसव्वुर की कमी है। भारतीय मुसलमानों को मज़हबी गरोह ने ये तालीम दी कि सियासत और हुकूमत दीन में नहीं है। दीन तो चिल्ला खींचने, ज़िक्र करने, नमाज़ और रोज़े का नाम है। इस तसव्वुर ने हमारे आम लोगों को सियासत से बिलकुल बेदख़ल कर दिया। वो सियासत को गुनाह समझने लगे। उस वक़्त के सियासी लीडर्स और मज़हबी गरोह ने हिस्सेदारी के बजाय ताबेदारी की सियासत को बढ़ावा दिया, नेक लोग मस्जिद और ख़ानक़ाहों तक महदूद हो गए।

मस्जिदों में सियासत का ज़िक्र करना तो दूर की बात, अगर तिजारत और लेन-देन के मामलों का ज़िक्र भी किसी ने कर दिया तो क़ौम ने ये कहकर रोक दिया कि ये दुनियादारी की बातें मस्जिद में नहीं हो सकतीं। इस पर फ़तवे पूछे जाने लगे कि क्या मस्जिद के लाउडस्पीकर से किसी तिजारती चीज़ की ख़रीद-बिक्री का ऐलान हो सकता है या नहीं? इस सूरतेहाल ने आम लोगों को सियासत से दूर कर दिया। अगर कुछ लोग आए भी तो वो दुनियादार कहलाए, उन्होंने भी कभी उसे दीनी फ़र्ज़ नहीं समझा। जिसने समझा उसको आलिम हज़रात के फ़तवों ने काफ़िर बना दिया।अब आप ही सोचिये पिछले सत्तर साल से जिस क़ौम को यही पढ़ाया जा रहा हो वो किस तरह सियासी तौर पर कोई ताक़त बन सकती है।

एक वजह ये रही कि जो सियासी गरोह बने या जिन लोगों ने अकेले तौर पर सियासी पार्टी बनाई, उस सियासी पार्टी के पास कोई ठोस सियासी नज़रिया नहीं था। वो वक़्ती तौर पर किसी रद्दे-अमल के नतीजे में वुजूद में आईं, कोई रणनीति, ज़मीन पर कोई तंज़ीमी ढाँचा उनके पास नहीं था। जैसे कि 1968 में अब्दुल-जलील फ़रीदी मरहूम (रह०) ने सियासी तहरीक ऑल-इण्डिया मुस्लिम मजलिस क़ायम की। मगर ये तहरीक केवल उत्तर प्रदेश की हद तक ही सिमट कर रह गई। इससे पहले 1959 में भी बस्ती शहर में मुस्लिम बुद्धिजीवियों का एक कन्वेंशन हुआ था। इसी कन्वेंशन के नतीजे के तौर पर ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस क़ायम हुई थी। मगर बदक़िस्मती से जो भी कोशिश हुईं, वो शुरूआती दौर में ही बिखराव का शिकार हो गईं।

हमारी कुछ तंज़ीमों या कुछ लीडर्स ने कुछ तंज़ीमों को इज्तिमाई कन्वेंशनों में शिरकत से रोक दिया। इस तरह वो सब कोशिशें नाकाम हो गईं। 1948 में इण्डियन मुस्लिम लीग ने जन्म लिया। 1958 में आन्ध्रा प्रदेश में मजलिस इत्तिहादुल-मुस्लेमीन दुबारा उभरकर आई, मुंबई में हाजी मस्तान मिर्ज़ा ने 1984 में “मुस्लिम-दलित सुरक्षा महासंघ” बनाई। 1995 में डॉक्टर मसऊद ने उत्तर प्रदेश में नेशनल लोकतान्त्रिक पार्टी (NLP), 2001 में मौलाना तौक़ीर रज़ा ख़ान ने उत्तर प्रदेश में इत्तिहादे-मिल्लत कौंसिल बनाई, 2005 में मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने आसाम में यू डी एफ़ (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट) और साल 2008 में डॉक्टर अय्यूब ने उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी बनाई।

इन सब में इण्डियन यूनियन मुस्लिम लीग, AIMIM और UDF की कारकर्दगी काफ़ी अच्छी रही, बाक़ी सियासी पार्टियाँ सियासी किताब का एक पेज बनकर रह गईं। ऊपर ज़िक्र की गई पार्टियों के अलावा वेलफ़ेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया, उलमा कौंसिल और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया भी मुसलमानों की सियासी बे-वज़्नी दूर करने के लिये मौजूद हैं। लेकिन ये पार्टियां अभी तक आम लोगों के दिल तक नहीं पहुँच सकी हैं।

इनकी नाकामी ने एक तरफ़ आम मुसलमानों को मायूस किया और दूसरी तरफ़ वो लीडर्स भी मायूस हो गए जो मुख़लिसाना जिद्दोजुहद कर रहे थे। इसकी वजह इसके सिवा और क्या है कि हमारे पास कोई ठोस तंज़ीमी ढाँचा नहीं था, हमारे अन्दर इज्तिमाई फ़ैसले लेने का हुनर नहीं था, हम अपने अलावा दूसरों पर भरोसा करने की ख़ूबी से महरूम थे, हम दिल की तंगी का शिकार थे और अपने मसलक से मतभेद करनेवालों को साथ लेकर चलने वाला बड़ा दिल नहीं रखते थे।

अन्दरूनी वजहों के अलावा मुस्लिम सियासी पार्टियों के सामने माली कठिनाइयाँ भी रहीं, सेक्युलर पार्टियों के मुस्लिम लीडर्स भी इनके रास्ते में मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं, मुसलमानों का पढ़ा-लिखा और सरकारी छूट से फ़ायदे हासिल करनेवाले तबक़े ने भी अपने फ़ायदों के लिये किसी मुस्लिम सियासी पार्टी को उभरने नहीं दिया। दूसरी तरफ़ तथाकथित सेक्युलर पार्टियों ने जिसमें कॉंग्रेस सबसे आगे रही, कभी मुस्लिम लीडरशिप को मज़बूत नहीं होने दिया, क्योंकि इससे उनके वुजूद को ख़तरा था।

संघ और उसके तहत काम करनेवाले दर्जनों संगठनों ने हालाँकि मुसलमानों में फुट डालने में तो बड़ा रोल अदा नहीं किया लेकिन उन्होंने धर्म की बुनियाद पर नफ़रत को हवा देकर बहुसंख्यक तबक़े के दिल में मुसलमानों की ज़ात और उनसे जुड़ी हर चीज़ से नफ़रत पैदा कर दी और ग़ैर मुस्लिम जो कभी मुसलमानों के साथ सहयोग करते थे और उनके हक़ दिलाने के लिये भी आवाज़ उठाते थे उससे महरूम कर दिया। अब सवाल ये है कि क्या मुसलमान आगे भी इसी तरह ताबेदारी की सियासत करेंगे या हिस्सेदारी की सियासत की तरफ़ क़दम बढ़ाएँगे?

हिस्सेदारी की सियासत का रास्ता अपनी सियासी पार्टी से ही होकर गुज़रता है। अब भी वक़्त है कि मुसलमान सियासत के बारे में अपने नज़रिये में सुधार लाएँ, इसे दीन का हिस्सा समझें, देश में अपनी आबादी के अनुपात से संसाधनों के इस्तेमाल की बात करें, गुमराह करनेवाले प्रोपेगण्डे को नज़र-अन्दाज़ करें, जिस राज्य और जिस इलाक़े में जो मुस्लिम सियासी पार्टी मज़बूत हो उसका सहयोग करें, अपने लीडर्स पर भरोसा करें और लीडर्स भी अपने ज़ाती फ़ायदों और हितों के बजाय मुसलमानों और देश के हित में क़ुर्बानी दें।

इस वक़्त मुसलमानों की अक्सरियत मुस्लिम सियासी लीडर्स की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देख रही है। देश की सियासत में मुसलमान बहुत ही नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं। अभी भारतीय संविधान में अपनी हिस्सेदारी का मौक़ा है, इससे पहले कि ये मौक़ा हाथ से निकल जाए हमें मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहिये वरना तारीख़ कभी माफ़ नहीं करेगी।

(यह लेखक के अपने विचार हैं लेखक कलीमुल हफ़ीज़ एआईएमआईएम दिल्ली के अध्यक्ष हैं)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button