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झारखंड: जलमा गांव में 150 साल से मोहर्रम मना रहें हिंदू, सिर्फ एक मुस्लिम परिवार के बावजूद कायम है परंपरा

झारखंड के हजारीबाग जिले के जलमा गांव में सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनोखी मिसाल देखने को मिलती है। हिंदू बहुल इस गांव में केवल एक मुस्लिम परिवार रहता है, लेकिन इसके बावजूद यहां पिछले लगभग 150 वर्षों से हिंदू समुदाय के लोग मुहर्रम की परंपरा को निभाते आ रहे हैं।

हर साल गांव के लोग ताजिया और निशान तैयार करते हैं, पाइक बंधन जैसी धार्मिक रस्में निभाते हैं और चाडवा बांध के पास आयोजित होने वाले पारंपरिक मुहर्रम जुलूस में भाग लेते हैं। गांव के इमामबाड़ा में होने वाली अधिकांश तैयारियां और धार्मिक आयोजन भी हिंदू परिवारों की देखरेख में होते हैं।

जलमा मुहर्रम समिति के अध्यक्ष अंतु सॉ ने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत उनके परदादा खेजल तेली ने की थी। इसके बाद उनके दादा, पिता और अब वर्तमान पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की पहचान और पूर्वजों की विरासत का हिस्सा है।

इस वर्ष गांव के प्रवीन रविदास पहली बार पाइक बंधन का व्रत निभा रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपने बुजुर्गों को वर्षों से यह परंपरा निभाते देखा है और अब वे भी इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं।

गांव के इमामबाड़ा की देखरेख भी दो हिंदू मुजावर—सुधीर साहब और राजू साहब—करते हैं। दोनों सालभर इमामबाड़ा की सफाई, मरम्मत और रखरखाव का जिम्मा संभालते हैं। इस वर्ष मुहर्रम से पहले उन्होंने इमामबाड़ा की नई चारदीवारी, रंग-रोगन और सजावट का कार्य भी कराया।

हर साल जलमा गांव चाडवा बांध में आयोजित मुहर्रम जुलूस और मेले में 22 अन्य गांवों के साथ हिस्सा लेता है। चाडवा मुहर्रम समिति के सदस्य साजिद अली खान के अनुसार, पहले कई हिंदू-बहुल गांव इस परंपरा में शामिल होते थे, लेकिन समय के साथ उन्होंने भाग लेना बंद कर दिया। जलमा आज भी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभा रहा है।

समिति हर वर्ष जलमा गांव को सांप्रदायिक सद्भाव और इस परंपरा को जीवित रखने के लिए सम्मानित भी करती है। इस वर्ष गांव ने ताजिया प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार भी हासिल किया। गांव के लोगों का कहना है कि यह परंपरा इस बात का संदेश देती है कि आपसी सम्मान, भाईचारा और इंसानियत किसी भी धर्म से ऊपर है।

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