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मध्य प्रदेश: UCC विधेयक का विरोध, भोपाल के काज़ी ने मुसलमानों को छूट देने की मांग की; बोले- ‘व्यक्तिगत कानून की रक्षा जरूरी

मध्य प्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक 2026 को लेकर मुस्लिम समुदाय की ओर से विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। भोपाल शहर के काज़ी मौलाना सैयद मुश्ताक अली नदवी ने राज्य सरकार से विधेयक वापस लेने या कम से कम मुस्लिम समुदाय को इसके दायरे से बाहर रखने की मांग की है। उनका कहना है कि विवाह, उत्तराधिकार और वसीयत जैसे मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

भोपाल में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौलाना नदवी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय लंबे समय से अपने व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह, विरासत और वसीयत जैसे मामलों का पालन करता आया है। उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक नहीं बल्कि कानूनी और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने बताया कि वरिष्ठ वकीलों की एक कानूनी समिति बनाई गई है, जो जरूरत पड़ने पर UCC के प्रावधानों को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रही है।

नदवी ने कहा, “आरोप लगाने वालों को यह समझना चाहिए कि हम अपने कार्यों का जवाब दे सकते हैं। हमारी कानूनी समिति भी अदालत जाने की तैयारी कर रही है।” उन्होंने सरकार से अपील की कि अगर UCC को वापस नहीं लिया जाता है तो मुस्लिम समुदाय को इसके प्रावधानों से छूट दी जाए।

उन्होंने आदिवासी समुदाय को प्रस्तावित छूट का हवाला देते हुए कहा, “अगर 21 प्रतिशत आदिवासी समुदाय को UCC से बाहर रखा जा सकता है, तो 6 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय को भी बाहर रखा जाना चाहिए।” उनके अनुसार, ऐसी छूट से सामाजिक शांति, भाईचारा और सद्भाव बनाए रखने में मदद मिल सकती है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय से अपने व्यक्तिगत कानून का पालन करने और युवाओं में विवाह तथा अन्य सामाजिक प्रथाओं को लेकर जागरूकता बढ़ाने की भी अपील की।

भोपाल शहर के काज़ी और भोपाल शहर मुफ्ती अब्दुल कलाम कासमी ने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को एक ज्ञापन सौंपकर भी मुस्लिम समुदाय को UCC से छूट देने की मांग की। कासमी ने कहा कि मुसलमान इस्लामी शरिया को धार्मिक और व्यक्तिगत मामलों में महत्वपूर्ण मानते हैं तथा देश के कानूनों का सम्मान करते हैं, लेकिन उनके अनुसार निजी जीवन और धार्मिक सिद्धांतों में अनावश्यक हस्तक्षेप उचित नहीं है।

मध्य प्रदेश के संयुक्त अल्पसंख्यक मंच ने भी UCC विधेयक का विरोध करते हुए मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए छूट की मांग की है। मंच का कहना है कि भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करता है। मंच ने विवाह, तलाक, विरासत और वसीयत जैसे व्यक्तिगत मामलों को लेकर व्यापक संवैधानिक संरक्षण की मांग की है। साथ ही यह सवाल भी उठाया गया कि यदि अनुसूचित जनजातियों समेत कुछ समुदायों को कानून से छूट दी जा सकती है, तो मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को ऐसी छूट क्यों नहीं मिल सकती।

ईसाई समुदाय ने भी जताई चिंता

प्रेस कॉन्फ्रेंस में ईसाई धर्मगुरु फादर अनिल मार्टिन ने भी धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि घरों में प्रार्थना या धार्मिक गीत गाने जैसी गतिविधियों को लेकर ईसाई समुदाय के लोगों को कभी-कभी आपत्तियों और धर्मांतरण के आरोपों का सामना करना पड़ता है।

मार्टिन ने कहा, “हमें इस बात की चिंता है कि हमारी धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जा रही है।” उन्होंने UCC में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधानों को लागू करने से पहले व्यापक परामर्श की मांग की। उन्होंने कहा कि महिला संगठनों, आदिवासी समुदायों, धार्मिक समूहों, वकीलों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से बातचीत की जानी चाहिए।

चचेरे भाई-बहनों के विवाह को लेकर फैला भ्रम

UCC विधेयक पारित होने के बाद भोपाल में चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह को लेकर भी भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी। ऐसी खबरें और अफवाहें सामने आईं कि नए कानून के तहत करीबी रिश्तेदारों के बीच इस तरह के विवाह पर रोक लग जाएगी।

इस भ्रम के चलते भोपाल के काज़ी कार्यालय में निकाह के लिए आने वाले आवेदनों की संख्या कथित तौर पर प्रतिदिन 30-40 से बढ़कर 200-250 से अधिक हो गई। बाद में मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सनवार पटेल द्वारा सरकार से स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद स्थिति स्पष्ट हुई। सरकार ने कहा कि UCC विधेयक इस तरह के विवाहों पर प्रतिबंध नहीं लगाता।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह भ्रम विधेयक की धारा 4(4) के हिंदी अनुवाद में हुई कथित गड़बड़ी के कारण पैदा हुआ था। सरकारी स्पष्टीकरण के बाद स्थिति सामान्य हो गई।

अब मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई सी. पटेल ने UCC विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया है। ऐसे में मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक संगठनों की आपत्तियों तथा विधेयक के प्रावधानों को लेकर आगे की कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया पर नजर बनी हुई है।

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