नई दिल्ली: भारत में वर्ष 2014 से 2024 के बीच हुई मॉब लिंचिंग और भीड़ हिंसा की घटनाओं पर एक विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया गया है। “Mob Lynching in India – A Record — 2014-2024” नाम से प्रकाशित 744 पन्नों की इस रिपोर्ट में इस दशक के दौरान मॉब लिंचिंग की 1,743 घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया है। रिपोर्ट को वरिष्ठ पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष जफरुल-इस्लाम खान ने संकलित और संपादित किया है।
रिपोर्ट में मई 2014 से मई 2024 तक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के दोनों कार्यकालों के दौरान भीड़ हिंसा के बदलते स्वरूप का अध्ययन किया गया है। अध्ययन के अनुसार भारत में भीड़ हिंसा का इतिहास पुराना है, लेकिन 2014 के बाद मॉब लिंचिंग ने एक अलग और लगातार दिखाई देने वाला रूप लिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां पहले साम्प्रदायिक दंगे कुछ दिनों तक चलने वाली घटनाओं के रूप में सामने आते थे, वहीं अब भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा कई इलाकों में रोजमर्रा की घटना जैसी होती जा रही है।
अध्ययन के मुताबिक, इन घटनाओं का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिमों, ईसाइयों और दलितों को निशाना बनाने वाले घृणा अपराधों से जुड़ा है। रिपोर्ट में गौ-रक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा को भी विशेष रूप से दर्ज किया गया है। इसमें गोमांस रखने या खाने, गौ-हत्या और मवेशियों के व्यापार के आरोपों को लेकर भीड़ द्वारा की गई हिंसा का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि कई राज्यों में तथाकथित गौ-रक्षक समूहों ने खुद को कानून लागू करने वाली ताकत के तौर पर स्थापित कर लिया। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि ऐसे समूहों ने मवेशियों से लदे वाहनों से अवैध वसूली और लूटपाट की।
रिपोर्ट में मॉब लिंचिंग के तौर-तरीकों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। इसके अनुसार सार्वजनिक स्थानों, बसों, ट्रेनों और सड़कों पर मुस्लिम पहचान के प्रतीकों जैसे दाढ़ी या टोपी की वजह से लोगों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं। कई मामलों में पीड़ितों से धार्मिक नारे लगवाने की कोशिश की गई और इनकार करने पर उनके साथ मारपीट की गई। अध्ययन का कहना है कि ऐसी घटनाओं ने खासकर गरीब और कमजोर वर्ग के मुस्लिम लोगों के लिए सार्वजनिक स्थानों पर यात्रा करने के जोखिम को बढ़ाया है।
अध्ययन में सोशल मीडिया और तकनीक की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार कई मामलों में हमलावर खुद हिंसा के वीडियो बनाकर उन्हें व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आरोपियों को जल्द जमानत मिलने और कुछ मामलों में राजनीतिक या सामाजिक संरक्षण मिलने से अपराधियों के बीच बेखौफ होने की भावना बढ़ी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई मौकों पर राजनीतिक हस्तियों द्वारा हिंसा के आरोपियों के प्रति सार्वजनिक समर्थन या कानूनी मदद दिए जाने की घटनाएं सामने आई हैं।
रिपोर्ट मॉब लिंचिंग के पीछे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारणों का भी विश्लेषण करती है। इसमें कहा गया है कि बेरोजगार युवाओं को vigilante समूहों में शामिल कर उन्हें हिंसक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अध्ययन के अनुसार ऐसे समूह चुनावों के दौरान राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भी सक्रिय किए जा सकते हैं। रिपोर्ट में मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि कुछ टीवी चैनल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म घृणा और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाली सामग्री को प्रसारित करते हैं।
हालांकि, अध्ययन ने अपने आंकड़ों को पूर्ण या अंतिम आंकड़ा नहीं बताया है। रिपोर्ट के अनुसार इसमें मुख्य रूप से दिल्ली से प्रकाशित प्रमुख अखबारों, कुछ समाचार पोर्टलों और सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी का इस्तेमाल किया गया है। स्थानीय अखबारों और सभी पुलिस थानों के रिकॉर्ड की व्यापक जांच संसाधनों की कमी के कारण नहीं हो सकी। इसलिए रिपोर्ट का कहना है कि वास्तविक घटनाओं की संख्या दर्ज किए गए आंकड़े से काफी अधिक हो सकती है। रिपोर्ट में पुलिस हिरासत में मौत और राज्य प्रायोजित मुठभेड़ जैसी घटनाओं को अलग श्रेणी में रखा गया है।
रिपोर्ट में मॉब लिंचिंग से निपटने के लिए एक सख्त और समर्पित एंटी-लिंचिंग कानून बनाने, घृणा अपराधों के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था विकसित करने, पुलिस की जवाबदेही तय करने, पीड़ितों और उनके परिवारों को तत्काल मुआवजा और मुफ्त कानूनी सहायता देने तथा ऑनलाइन नफरत और इस्लामोफोबिया के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग की गई है। रिपोर्ट सरकार से घृणा अपराधों से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करने और ऐसे मामलों में आरोपियों के लिए कड़े जमानत प्रावधान लागू करने की भी सिफारिश करती है।
744 पन्नों की यह रिपोर्ट वर्ष 2026 में फॉरोस मीडिया, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है और इसकी कीमत 900 रुपये रखी गई है। रिपोर्ट को तैयार करने में शोधकर्ताओं की एक टीम ने कई वर्षों तक काम किया है। इसके संपादक जफरुल-इस्लाम खान दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार हैं। अध्ययन का निष्कर्ष है कि भीड़ के हाथों कानून अपने हाथ में लेने की बढ़ती प्रवृत्ति भारत के संवैधानिक ढांचे और कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती है।

