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आखिर क्यों परिसीमन के नाम पर मुस्लिम राजनीती ख़त्म की जा रहीं हैं? मुस्लिम बहुल सीटों को क्यों Sc/St के लिए रिज़र्व किया जा रहा हैं, पढ़िए पूरी ख़बर

आखिरी बार कांग्रेस के शासन काल में लोकसभा सीटों का परिसीमन हुआ था जिसमें बहुत सारी मुस्लिम बहुल सीटों को दलित आरक्षित कर के मुस्लिम राजनीती को वहां से लगभग समाप्त कर दिया गया है।

ये सीटें ऐसी थी कि यहां से कोई भी मुस्लिम व्यक्ति आसानी से चुनाव जीत सकता था और राजनीतिक तौर पर हाशिये पर धकेले गए मुस्लिम समुदाय को इन सीटों से आसानी से मुस्लिम सांसद मिल सकते थे।

देश में बहुत सारी सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है और दलित आबादी कम है इसके बावजूद उसे आरक्षित कर दिया गया है. इसके उल्ट कई सीटें ऐसी है जहां दलित आबादी बहुत ज्यादा है इसके बावजूद उन सीटों को जनरल कैटोगरी में रखा गया है।

दलित आरक्षित सीट होने का मुस्लिम समुदाय को सबसे बड़ा नुकसान ये है कि वहां मुसलमानों द्वारा चुनाव जीतना तो दूर चुनाव लड़ने पर भी पाबंदी लग जाती है।

4 सीटों के उदाहरण से इस पूरे मामले को समझने की कोशिश करते हैं।

पहली सीट है रायबरेली, जिसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की परंपरागत सीट माना जाता है. इसके जातीय समीकरण को देखेंगे तो इस सीट पर 30 फीसदी से ज्यादा दलित मतदाता हैं. यहां पर 12 फीसदी मुस्लिम मतदाता भी हैं. दलित बहुल सीट होने के बावजूद इसको परिसीमन के नाम पर आरक्षित न कर के जनरल सीट ही रखा गया है।

दूसरी तरफ जिस बहराइच लोकसभा सीट से 6 बार मुस्लिम सांसद रहा हो और जिले की 35 फीसदी की आबादी मुस्लिम हो उसे 2009 के परिसीमन में दलित आरक्षित सीट घोषित कर दिया गया. जिसके बाद यहाँ से मुस्लिम राजनीती (सांसदी के तौर पर) का लगभग खात्मा हो चुका है. इस सीट पर केवल 15.6 फीसदी दलित आबादी है फिर भी इस सीट को परिसीमन में आरक्षित किया गया है।

तीसरी सीट अमेठी लोकसभा सीट है जिसको गांधी परिवार की परंपरागत सीट माना जा सकता है. इस सीट से संजय गांधी एक बार, राजीव गांधी चार बार, सोनिया गांधी एक बार और राहुल गांधी तीन बार सांसद रह चुके हैं. इस सीट के जातीय समीकरण को समझिये कि यहां दलित वोटर्स की गिनती 27 फीसदी हैं. इसके साथ ही यहाँ मुस्लिम आबादी भी 19 फीसदी है।

इसके उल्ट बिजनौर जिले की लोकसभा सीट नगीना जो दलित आरक्षित है इसके बावजूद कि इस लोकसभा के 46 फीसदी वोटर्स मुस्लिम समुदाय से है. यहाँ कि दलित आबादी केवल 21 फीसदी है।

जिस मुस्लिम बहुल लोकसभा सीट से मुस्लिम आसानी से सांसद बन सकते थे उस को परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित सीट में तब्दील कर के यहाँ की मुस्लिम राजनीती को खत्म कर दिया गया है।

अब आप खुद बताये ये कैसा परिसीमन है जिसमें 27% दलित आबादी वाली लोकसभा सीट तो जनरल कैटोगरी में है मगर एक मुस्लिम बहुल सीट जहां केवल 21 फीसदी दलित है उसे आरक्षित कर दिया जाता है. एक सीट जहां दलित 30 फीसदी से भी ज्यादा है उसे जनरल छोड़ कर 15.6 फीसदी दलित आबादी वाली सीट को आरक्षित कर दिया जाता है।

अब परिसीमन के नाम पर हुए इस अन्याय को देखने के बाद कुछ सवाल हर व्यक्ति के दिमाग में गर्दिश करते है जिसके जवाब शायद किसी के पास भी नहीं हैं।

  1. क्या परिसीमन के नाम पर मुस्लिम बहुल सीटों को दलित आरक्षित करना पहले से ही हाशिये पर मौजूद मुस्लिम राजनीती को ख़त्म करने की साजिश तो नहीं?
  2. कांग्रेस पार्टी जो सेकुलरिज़्म की झंडा वाहक है जो अभी मुसलमानों के सबसे बड़े हितैषी होने का दावा करती है उसके राज में ही मुसलमानों के साथ राजनीतिक तौर पर इतना बड़ा अन्याय कैसे हो गया?
  3. राजनीतिक तौर पर बेहद पिछड़ा मुस्लिम समुदाय राजनीतिक भागीदारी के लिए आखिर कब तक तरसता रहेगा?

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