सम्पादकीय

मुसलमानों की अपनी सियासी लीडरशिप न होने की वजह से उनकी आवाज़ उठाने वाला भी कोई नहीं है

किसी इन्सान की ख़ुशहाली और तरक़्क़ी उसकी माली हालत पर डिपेंड करती है। अमीर आदमी को सब कुछ मिल जाता है। ग़रीब सिर्फ़ आरज़ू करके रह जाता है। पैसा है तो बच्चे भी अच्छे स्कूल में तालीम पाते हैं। बड़े कारोबार भी किये जा सकते हैं। सियासत में भी मक़ाम बनाया जा सकता है। पैसा नहीं है तो अपना साया भी ताने देने लगता है। कहते हैं कि किसी को झुकाना हो तो उसके पेट पर लात मार दो। यानी उसकी माली सरगर्मियों पर चोट कर दो। आज़ाद हिन्दुस्तान में मुसलमानों के साथ यही कुछ हुआ। मुसलमानों की माली सरगर्मियाँ एक-एक करके ख़त्म की जाती रहीं और मुसलमान कारख़ानेदार से मज़दूर हो गए।

उत्तर प्रदेश जहाँ के हर बड़े शहर में एक बड़ी इंडस्ट्री में मुसलमान छाए हुए थे। आज वो तमाम इण्डस्ट्रियाँ या तो दम तोड़ रही हैं या फिर मुसलमानों के हाथ से निकल गई हैं। कानपुर में चमड़े, फ़िरोज़ाबाद में चूड़ियाँ, मुरादाबाद में पीतल के बर्तन, लखनऊ में चिकन कढ़ाई, रामपुर के चाक़ू, बरेली का सुरमा, क़न्नौज का इत्र, बनारस की साड़ी, सहारनपुर में हैंडी-क्राफ़्ट, अलीगढ़ के ताले और मेरठ की क़ैंचियाँ ज़माने भर में मशहूर हुआ करती थीं और इनमें से हरेक इंडस्ट्री में मुसलमान आगे थे, वही इसके बेहतरीन कारीगर थे, लेकिन धीरे-धीरे सरकार ने साज़िश करके, प्लानिंग करके इन इंडस्ट्रीज़ को मुसलमानों से छीन लिया। कपड़ा बुनाई और रँगाई तक के काम जो ख़ालिस मुसलमानों से जुड़े थे आज ग़ैर-मुस्लिमों के कण्ट्रोल में हैं। यहाँ तक कि गोश्त के बड़े व्यापारी और एक्सपोर्टर्स ग़ैर-मुस्लिम हैं।

इस वक़्त मेरे सामने एक रिपोर्ट है जिसे 7 जनवरी को आल इंडिया मजलिस इत्तिहादुल-मुस्लेमीन ने लखनऊ में जारी की है। इसमें उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के ताल्लुक़ से आँखें खोल देनेवाले आंकड़े दिये गए हैं। ये आँकड़े हमें ख़ून के आँसू रुलाते हैं। कोई भी तो ऐसा सम्मानित विभाग नहीं जहाँ हम अपने देश की किसी दूसरी क़ौम से आगे हों। तालीम, सेहत, कारोबार, खेती, सरकारी नौकरियाँ, हर जगह हम दलितों से भी बहुत पीछे हैं। अलबत्ता जेलों में अपनी आबादी से ज़्यादा हैं। ऐसा भी नहीं कि मुसलमानों का समझदार तबक़ा यहाँ न हो, यहाँ मुसलमानों के बड़े-बड़े दारुल-उलूम हैं। ज़्यादा तर मुस्लिम जमाअतों के लीडर्स इसी राज्य से हैं, मुस्लिम सियासत में भी बड़े-बड़े रहनुमा यहाँ पैदा हुए, इसके बावजूद मुसलमान हर दिन डूबते सूरज के साथ पिछड़ेपन की कुछ और गहराइयों में जा रहे हैं।

रोज़गार से सम्बन्धित कुछ आँकड़े आप भी देखिये। ये आँकड़े सरकारी रिपोर्टों से हासिल किये गए हैं। मजलिस की रिपोर्ट में कुछ और तफ़सीलात देखी जा सकती हैं। किसी क़ौम की ख़ुशहाली उसकी आमदनी के बजाय उसके ख़र्च से नापी जाती है, इसलिये कि कोई शख़्स उसी वक़्त ख़र्च कर सकता है जब उसकी आमदनी हो। देश में एक फ़ैमिली माहाना 988 रुपये ख़र्च करती है, उत्तर प्रदेश का मुसलमान सिर्फ़ 752 रुपये माहाना ख़र्च करता है। यानी एक पूरा घर 25 रुपये रोज़ाना ख़र्च करता है। बाक़ायदा माहाना तनख़ाह पानेवाले मज़दूरों का औसत देश में 31.6% है और यू पी के मुसलमानों का ये औसत 25.6% है। यही हाल सर्विस सेक्टर में मज़दूरी का है। यू पी के मुसलमानों का औसत 27.3% है। जबकि पूरे देश में ये औसत 32.2% है। इसका मतलब है कि उत्तर प्रदेश का मुसलमान कम आमदनी वाली केटेगरी में सबसे नीचे है।

सन 1993-94 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ खेती के विभाग में मुसलमान 44.7% थे जो 2009-10 में घटकर 36.5% रह गए। जबकि इसी विभाग में उत्तर प्रदेश के दलितों दर 51.4% और OBC ग़ैर-मुस्लिमों की दर 65.5% है। कंस्ट्रक्शन के विभाग में राज्य का दलित 2009-10 में 24.8% और मुसलमान 10.3% ही है। यहाँ तक कि 48.5% मुसलमानों के पास अपना घर तक नहीं है। सरकारी सेवाओं में नुमाइन्दगी कम्युनिटी की हैसियत को तय करने का एक अहम इशारा है। ये लोगों को ख़ुशहाल भी बनाता है और ताक़त भी देता है। ये बात सब जानते हैं कि मुसलमानों के तालीमी पिछड़ेपन और नौकरियों के सिलसिले में उनके साथ अ-घोषित भेदभाव के सुलूक की नीति की वजह से सरकारी नौकरियों में उनकी नुमाइन्दगी कम है।

यूपी के एक सर्वे से मालूम होता है कि सरकारी नौकरियों में OBC मुसलमानों का हिस्सा आबादी में उनके हिस्से से बहुत कम है। दूसरी तरफ़ ग़ैर-मुस्लिम OBC जैसे यादव, कुर्मी और जाट OBC कोटा हासिल कर लेते हैं। इसी तरह माइनोरिटीज़ के नाम पर जो सरकारी छूट हैं उन्हें जैन, बौद्ध, और सिख समाज ले जाता है। सरकारी आँकड़ों से पता चलता है कि 2015 में UPPSC ने 521 कैंडिडेट्स को सेलेक्ट किया था जिनमें से केवल 19 यानी 3.65% मुसलमान थे। इसी तरह अधीनस्थ सेवाओं के मामले में 2013 में सेलेक्ट किये गए 1545 कैंडिडेट्स में से केवल 31 यानी 2.01% मुसलमान थे। यूनिवर्सिटी के टीचर्स के मामले में भी यही कहानी दोहराई जाती है। स्टेट यूनिवर्सिटियों में काम करने वाले 1834 यूनिवर्सिटी टीचर्स में से, केवल 57 यानी 3.11% मुसलमान थे। यूपी हायर एजुकेशन कमिशन के ज़रिए सेलेक्ट किये गए 727 असिस्टेंट प्रोफ़ेसर्स में से 149 सीटें OBC के लिये रिज़र्व थीं, इन सीटों के लिये केवल 4.69% मुसलमानों का सिलेक्शन किया गया था।

राज्य से बाहर जाकर रोज़गार तलाश करनेवालों में मुसलमान सबसे ज़्यादा हैं। एक सर्वे के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के बाहर जाकर रोज़गार तलाश करनेवालों में 51% मुसलमान हैं। इसका मतलब है कि मुसलमान अपनी आबादी से तीन गुना ज़्यादा हैं। ज़ाहिर बात है कि बाहर जाने की ज़रूरत तब ही पड़ती है जबकि किसी को उसके अपने मक़ाम पर रोज़गार के अवसर न मिल पा रहे हों। देश से बाहर जाना उस वक़्त तो अच्छा इशारा है जबकि वो किसी बड़े पदों पर काम करने गए हों, लेकिन मुसलमानों का ये बाहर जाना बहुत छोटे कारोबार या मज़दूर की हैसियत से है। मिसाल के तौर पर मुंबई, दिल्ली में छोटे कामगारों और मज़दूरों का ताल्लुक़ दूसरे राज्यों से है। इनमें भी बड़ी तादाद मुसलमानों की है। घर से बाहर जाकर काम करने की वजह से मुसलमानों का फ़ैमिली सिस्टम, बच्चों की पढ़ाई, अपने समाज के लिये उनकी सेवाएँ वग़ैरह सब प्रभावित होते हैं।

माली सरगर्मियों में बैंकों का अहम् रोल है। मुस्लिम इलाक़ों में बैंकों की सहूलतें भी कम हैं, संभल और बलरामपुर जहाँ सबसे ज़्यादा मुसलमान हैं, वहीँ सबसे कम बैंक हैं, फिर बैंकों ने ज़्यादातर मुस्लिम इलाक़ों को ब्लैक-लिस्ट कर रखा है, कोई ये पूछने वाला नहीं कि इन इलाक़ों के मुस्लिमों को बैंक क़र्ज़ क्यों नहीं देते, मुस्लिम इलाक़ों में एटीएम मशीनें भी बहुत कम हैं। मुस्लिम बस्तियों को हाईवे से जोड़ने में भी सरकारों ने पक्षपात से काम लिया है। सरकारों की तरफ़ से खोले जानेवाले कारख़ाने और फ़ैक्ट्रियाँ भी मुस्लिम बस्तियों से दूर रखी गई हैं। ये सब काम इसीलिये हैं कि मुसलमान ख़ुशहाल न हो, वो ग़रीब रहेगा तो ग़ुलाम रहेगा।

सवाल ये है कि ये सूरते-हाल किस तरह बदली जा सकती है। किसी भी क़ौम की तरक़्क़ी और ख़ुशहाली के लिये सरकारें ही प्लानिंग कर सकती हैं, दलित समाज ने अपनी सियासी लीडरशिप खड़ी करके और रिज़र्वेशन की बदौलत आज अपनी हालत ख़ैरे-उम्मत से बेहतर कर ली है, इसी तरह यादव, जाट, कुर्मी, मौर्य इत्यादि हैं जिनकी अपनी सियासी लीडरशिप ने उनके लिये क़ानूनी और निजी तौर पर दोनों तरह की तरक़्क़ी के दरवाज़े खोले हैं। मुसलमानों को रिज़र्वेशन दिया जाए, एक पार्टी ने वादा किया था लेकिन पाँच साल तक हुकूमत में रहने के बावजूद उसने मुसलमानों के रिज़र्वेशन पर ज़बान तक नहीं खोली। अगर मुसलमान सियासी तौर पर अपनी लीडरशिप को मज़बूत करें तो रिज़र्वेशन के लिये सरकार को मजबूर किया जा सकता है।

हमें ये याद रखना चाहिये कि किसी भी तथाकथित सेक्युलर पार्टी ने हमारे साथ ज़ुल्म करने में कोई कमी बाक़ी नहीं रखी है। इस वक़्त भी उत्तर प्रदेश में जो सियासी सरगर्मियाँ जारी हैं वो खुले आम मुसलमानों के साथ भेदभाव पर आधारित हैं। बाबरी मस्जिद गिराने, मन्दिर को बनाने, मुज़फ़्फ़र नगर दंगे, लव जिहाद के नाम पर शादी के क़ानून में बदलाव, मुस्लिम नौजवानों पर UAPA का निरंकुश इस्तेमाल, CAA-NRC पर ख़ामोशी, मौलाना कलीम सिद्दीक़ी, उमर गौतम की गिरफ़्तारी, तब्लीग़ी जमाअत को बदनाम करने की घटनाएँ कुछ ज़्यादा पुरानी नहीं हैं, इसी के साथ रोज़गार और तालीम के अवसर हासिल करने में सरकारों का पक्षपात हमारी आँखें खोलने के लिये काफ़ी है।

(यह लेखक के अपने विचार हैं लेखक कलीमुल हफ़ीज़ एआईएमआईएम दिल्ली के अध्यक्ष हैं)

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