सम्पादकीय

कन्हैया के लच्छेदार भाषण सुनके ताली बजाने और उसे अपना मसीहा मानने वाले मुसलमानों को थोड़ी शर्म तो ज़रूर आयी होगी

बिहार के सिवान में पत्रकारों ने जब ‘कन्हैया कुमार’ से ‘उमर ख़ालिद’ को उसका दोस्त बताते हुए सवाल किया, तो कन्हैया ने छूटते ही कहा- ‘मैंने कब कहा उमर ख़ालिद मेरा दोस्त है? आपसे किसने कहा मेरा दोस्त है?’

ये कहते हुए कन्हैया कुमार ने उल्टे पत्रकारों से ही सवाल कर डाला। फिर एक पत्रकार ने ‘मीरान हैदर’ को लेके कन्हैया कुमार से सवाल किया जो मीरान हैदर एंटी सीएए प्रोटेस्ट का चेहरा था और आज तक़रीबन डेढ़ साल से जेल में है। इस सवाल पे भी कन्हैया ने पल्ला झाड़ते हुए कहा ‘मीरान हैदर मेरी पार्टी के हैं? मीरान RJD से थे’

सवाल ये है कि चलो मान लिया उमर ख़ालिद तुम्हारा दोस्त नहीं है। ये भी मान लिया मीरान हैदर तुम्हारी पार्टी से नहीं है। तो क्या तुम सिर्फ़ उनके लिए अपनी ज़बान खोलोगे जो तुम्हारी पार्टी से होंगे?

मुस्लिम लौंडे तो बिना पार्टी देखे तुमपे अपना जान-निसार करते हैं। बिचारे दिनभर तुम्हारे लच्छेदार तक़रीर शेयर कर-करके सबको तुम्हें अपना मसीहा बताते हैं। उन्हें लगता है अब बस तुम्हीं हो जो मुसलमानों के हालात बदल सकते हो। बताओ उनका क्या? उनके बारे में नहीं सोचा?

ख़ैर! अब कन्हैया कुमार के लच्छेदार भाषण सुनके ताली बजाने और उसे अपना मसीहा मानने वाले मुसलमान बिचारे गूगल से ख़ालिद और कन्हैया की तस्वीर पोस्ट-ट्वीट करके उसे बता रहे हैं। ‘अरे आपका साथी ही था आप भूल गए हैं’

मुझे तो तरस आ रहा ये सब कुछ देखके। कन्हैया के बीजेपी मुख़ालिफ़ तक़रीर शेयर करके उसे अपना मसीहा मानने वाले मुसलमानों थोड़ी शर्म तो ज़रूर आयी होगी आपको। शर्म आयी है? बोलो न शर्मा क्यों रहे हो?

हमारी उंगलियां घिस गईं ये लिखते लिखते कि- मुसलमानों बीजेपी के ख़िलाफ़ बोलने/लिखने वाले तुम्हारे मसीहा नहीं हैं। दरअसल उन्हें ख़ूब अच्छे से मालूम है मुसलमानों के दिलों में घर कैसे करना है।

सियासी तौर पे मुसलमान बीजेपी की मुख़ालिफ़त करने के सिवा कुछ नहीं जानता है। बीजेपी के ख़िलाफ़ चार लाइन बोल/लिख दीजिए बस मुस्लिम लौंडों में आप मक़बूल हो जाएंगे। आख़िर ये बात कब समझोगे भाई? सिर्फ़ कन्हैया नहीं दर्जनों ऐसी मिसालें हैं। पता नहीं क्यों ऐसे लोग कभी मेरे दिल में नहीं उतरते। इनकी हर तक़रीर, हर बयान मुझे मक्कारी से लबरेज़ लगती है। अच्छा है कम अज़ कम दुःख तो नहीं होता इनकी मक्कारी सामने आने के बाद।

आज मुझे इस बात की ख़ुशी हो रही है कि मैंने लोकसभा चुनाव में खुलकर इस मक्कार की मुख़ालिफ़त की थी।

(यह लेखक के अपने विचार हैं लेखक शाहनवाज अंसारी मुस्लिम एक्टिविस्ट हैं)

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