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सम्पादकीय

बर्बाद क़ौम अगर अपनी हालत बदलने की ठान ले तो कौन है जो उसे ग़ुलामी की दलदल में रहने पर मजबूर कर दे?

तक़दीर एक ऐसा शब्द है जो इंसान को आराम और इत्मीनान देता है। तक़दीर पर यक़ीन इंसान को टेंशन और डिप्रेशन से सुरक्षित रखता है। इसलिये कि टेंशन या डिप्रेशन और तक़दीर पर यक़ीन एक-दूसरे के विलोम हैं। लेकिन मुस्लिम समाज में इस शब्द का जितना ग़लत इस्तेमाल हुआ है शायद ही किसी और शब्द का हुआ हो।

यूँ तो हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने, लगभग अपने तमाम ही अक़ीदों में कुछ न कुछ फेर-बदल कर लिया है। लेकिन तक़दीर शब्द में इन्होंने जितना फेर-बदल कर लिया है वो बाक़ी अक़ीदों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है।

आज मुस्लिम समाज ग़ुलामी, ज़िल्लत और रुसवाई की जिस दलदल में जा गिरा है उसमें तक़दीर के ग़लत मतलब का बड़ा हिस्सा है। आज हम अपनी ग़रीबी, जहालत और ग़ुलामी को अपना नसीब मान कर आराम की नींद सोते हैं।

हमारा मज़दूर अपनी समाजी भाग-दौड़ को सिर्फ़ इसलिये नहीं बढ़ाता क्यूंकि वो समझता है कि यही उसके नसीब में है। यहाँ तक कि हमारे भीख माँगने वाले फ़क़ीर भी हाथ फैलाने को अपनी तक़दीर समझ कर सारी उम्र भीख माँगते हैं।

यही कुछ हाल हमारी राजनीति का है। हम ताक़त हासिल करने की तमन्ना से भी महरूम हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि अल्लाह ने हर चीज़ तय कर दी है। मगर ये बात भी सच है कि वो तै-शुदा चीज़ अल्लाह के सिवा किसी को मालूम नहीं।

मुझे नहीं मालूम कि मेरे लिये उसने क्या तय किया है? अगर मुझे मेरा मुक़द्दर मालूम ही नहीं तो मैं अपनी कमज़ोरी को मुक़द्दर क्यों तस्लीम कर लूँ?

क्यों न ख़ुद को ख़ुशहाल और ताक़तवर बनाने की जिद्दो-जहद करूँ? क्यों न तमन्ना करूँ कि एक दिन अपने मुल्क के लिये गर्व करने के योग्य बन जाऊँ? इस बात की आरज़ू क्यों न करूँ कि मेरी आने वाली नस्लें मुझसे बेहतर हालात में ज़िंदगी गुज़ारें?

एक ग़रीब इंसान जब अपनी ग़रीबी को मुक़द्दर समझ लेता है तो वो अपनी ख़ुशहाली को पाने के लिये कुछ नहीं करता, वो अपने हालात बदलने की कोशिश तो बहुत दूर तमन्ना भी नहीं करता।

इसलिये उसे कोई रास्ता भी नहीं दिखाई देता। वरना अगर वो अपनी हालत बदलने का निर्णय करे, अपने आस-पास के माहौल को देखे, अपनी आमदनी में बढ़ोतरी के रास्ते निकाले, अपनी योग्यताओं और अपने सरमाए की सही से प्लानिंग करे तो कोई वजह नहीं कि ख़ुदा उसकी मेहनत को बेकार कर दे।

इसी तरह बर्बाद क़ौम अगर अपनी हालत बदलने की ठान ले तो कौन है जो उसे ग़ुलामी की दलदल में रहने पर मजबूर कर दे? बीते हुए हज़ार साल का इतिहास उठा कर देख लीजिये कितनी ही दबी हुई क़ौमें, मुल्क की रहनुमा बन गईं।

ख़ुद भारत में आज़ादी के बाद ही हालात किस तरह बदले? हम सब जानते हैं। हमारी आँखों के सामने ही वो समाज जिसके हाथ का पानी पीना भी ख़ुद उन्ही के धर्म के लोग पसंद नहीं करते थे, वही उनके दफ़्तरों में चपरासी हो गए और उन्हें हर सुबह सलामी देने लगे।

इसी तरह इलाक़े के हिसाब से देखें तो क़ौम का वो हिस्सा जो कभी दाने-दाने को तरसता था आज वहाँ रिज़्क़ उबल रहा है। मेरा इशारा दक्षिण भारत से है।

इसी तरह वो पार्टियाँ जिनको कोई पूछने वाला नहीं था आज उनके दरवाज़े पर भीड़ लगी हुई है? क्या ये सब तक़दीर लिखने वाले ने उनके मुक़द्दर में लिख दिया था इसलिये हो गया? या उन्होंने इस रास्ते में कोशिशें कीं? और अपनी जिद्दो-जुहद में ईमानदार रहे इसलिये उसका नतीजा उनको मिला?

तक़दीर का ग़लत तसव्वुर हमारे निकम्मेपन को धार्मिक प्रमाण देता है। इसका मतलब है कि (अल्लाह पनाह में रखे) ख़ुद अल्लाह अपने महबूब (सल्ल०) की उम्मत पर ये ज़िल्लत डाल रहा है?

तक़दीर का ग़लत तसव्वुर इंसान को अमल की बुनियाद पर जज़ा और सज़ा से आज़ाद कर देता है। उस जुर्म की सज़ा कैसी जिसका करना ख़ुद अल्लाह ने मुक़द्दर कर दिया हो? और उस नेक अमल पर इनाम क्यों जिसका होना मुक़द्दर था?

तक़दीर का दख़ल उन मामलों में होता है जहाँ इंसान को इख़्तियार और आज़ादी न हो, जैसे इंसानों के पैदा किये जाने का अमल सरासर मुक़द्दर पर निर्भर है, इंसान के इख़्तियार में शादी करना है लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि उनके पास औलाद भी होगी।

इसी तरह इंसान का मर जाना भी अल्लाह की बनाई हुई एक तक़दीर है। इंसान के बस में अपनी सेहत की देखभाल और इलाज है लेकिन मौत से बच जाना या कभी न मरना उसके इख़्तियार में नहीं।

इसी तरह तक़दीर का अमल-दख़ल वहाँ से शुरू होता है जहाँ अमल का दख़ल ख़त्म हो जाता है। पहली बात तो ये कि किसी एक व्यक्ति या बहुत-से लोगों की मेहनत और ईमानदारी से जिद्दो-जुहद करना कभी बेकार नहीं जाता।

लेकिन अगर मान लीजिये कि कभी ऐसा हो भी जाए तो एक मोमिन उसे अल्लाह का फ़ैसला समझ कर स्वीकार कर लेता है। वो इस बात को समझने की कोशिश ज़रूर करता है कि उसकी कोशिशों में कहाँ कमी रह गई?

लेकिन वो अपनी नाकामी पर पागल नहीं होता, वो डिप्रेशन में नहीं चला जाता। बल्कि नए सिरे से अपनी जिद्दो-जुहद की शुरुआत करता है।
तक़दीर का ग़लत मतलब ख़ुद को धोखा देने के सिवा कुछ नहीं।

इस वक़्त आम तौर से पूरी मिल्लते-इस्लामिया और ख़ास तौर से हिन्दुस्तान के मुसलमान तक़दीर के ग़लत तसव्वुर को लिये बैठे हैं। इसमें भी (माफ़ कीजियेगा) हमारा वो तब्क़ा जो धार्मिक रस्मो-रिवाज की अदाएगी में आगे-आगे रहता है वो ख़ुद भी तक़दीर का बहाना बना कर बे-अमली का शिकार हो रहा है और समाज में भी इस ग़लत तसव्वुर को फैला रहा है।

मैं समझता हूँ कि हमें तक़दीर के उसी मतलब को सामने रखना चाहिए जो हमें हमारे नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने सिखाया है। आप (सल्ल०) ने बद्र की जंग में फ़ौज की क़तार को सही करने के बाद सजदे में गिर कर अपने रब से कहा था कि मैं जो कुछ कर सकता था कर दिया, बाक़ी अंजाम आपके हाथ में है।

यानी मैं तेरे जाँ-निसारों के साथ घर से निकल कर मैदान मैं आ गया हूँ, मेरे पास जंग के लिये जो सामान था वो ले आया हूँ। तेरी इबादत करने वाले अब दुश्मन के सामने खड़े हैं, अब हार और जीत तेरे हाथ में है।

आप (सल्ल०) ने अल्लाह का हुक्म लागू करने और इस्लाम को ग़ालिब करने के लिये तमाम मुमकिन तदबीर इख़्तियार फ़रमाई और उसके बाद तक़दीर पर भरोसा किया।

आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: “पहले ऊँट को खूँटे से बाँध फिर तक़दीर पर भरोसा कर” जिस उम्मत के पास अपने रसूल का ये उस्वा हो वो उम्मत हाथ पर हाथ धरे बैठ कर सब कुछ तक़दीर लिखने वाले से ही कराना चाहे तो यही अंजाम होता है जो इस वक़्त हमारा है; क्योंकि उसी तक़दीर लिखने वाले ने कहा है कि “यक़ीनन अल्लाह किसी क़ौम की हालत को उस वक़्त तक नहीं बदलता है जब तक वो ख़ुद अपने आप को न बदल ले।”

ख़बर नहीं क्या है नाम इसका ख़ुदा-फ़रेबी कि ख़ुद-फ़रेबी।
अमल से फ़ारिग़ हुआ मुसलमाँ बना के तक़दीर का बहाना॥

(यह लेखक के अपने विचार है लेखक कलीमुल हफ़ीज़ एआईएमआईएम दिल्ली के अध्यक्ष है)

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