सम्पादकीय

भारत के हर शहरी को अपनी पसन्द का मज़हब अपनाने, उसकी तबलीग़ करने, उसके मुताबिक़ डेमोक्रेटिक तरीक़े पर हिन्दुस्तान को बनाने की आज़ादी है

दुनिया दारुल-अस्बाब है। यानी इस दुनिया में हर काम को करने के लिये साधन की ज़रूरत पड़ती है। यहाँ के नतीजे हमारे अमल (Activism) पर डिपेंड होते हैं और अमल का दारोमदार नीयतों पर है। हम मुसलमान अमल से ज़्यादा नसीब और तक़दीर का बहाना करके बे-अमली ज़ाहिर करते हैं। सोने पे सुहागा ये कि हर नमाज़ में अल्लाह से सब कुछ माँग कर दिल को मुत्मइन कर लेते हैं।

दुआएँ भी अजीबोग़रीब करते हैं। मिसाल के तौर पर हम दुआ करते हैं कि ऐ अल्लाह जो माँगा वो भी अता फ़रमा जो माँगने से रह गया वो अता फ़रमा, जो हमारे बुज़ुर्गों ने माँगा वो भी अता फ़रमा, हमने कभी अपनी दुआओं का जायज़ा भी नहीं लिया कि कितनी पूरी हुईं और कितनी रह गईं, और पूरी नहीं हुईं तो क्यों नहीं हुईं, पूरी न होने का भी हमें एक हल मिल गया। जो दुआएँ दुनिया में पूरी नहीं होंगी उनका अज्र आख़िरत में मिल जाएगा।

मुझे इनमें से हर बात से इत्तिफ़ाक़ है। मैं कहता हूँ कि अल्लाह पूरी क़ुदरत रखता है वो सब कुछ अता कर सकता है। मगर हमें अपने अन्दर झाँक कर भी देखना चाहिये और जिससे हम माँग रहे हैं उससे अपने रिश्ते की नौइयत और कैफ़ियत भी देखनी चाहिये। इसी के साथ दुआ से पहले के मरहलों से भी गुज़रना चाहिये। अल्लाह से हमारा रिश्ता दोस्ताना है या मुख़ालिफ़ाना। इख़्लास वाला है या दो-मुँहा? हम जो माँग रहे हैं उसके तक़ाज़े भी हमने पूरे किये या नहीं?

एक स्टूडेंट न स्कूल जाए, न किताब खोले और कलेक्टर बनने की दुआ करे तो ये दुआ नहीं अल्लाह के साथ भोंडा मज़ाक़ है। हम मैदाने-जंग का रुख़ भी न करें, हमारे जिस्म पर कोई ख़राश भी न आए और दुआ माँगी जाए फ़तह की, तो वो दुआ पूरी हो जाए ये कैसे मुमकिन है। ख़ुदा का नाम लेकर शैतान की ताबेदारी की जाए और ख़ुदा से अज्र की उम्मीद रखी जाए तो ये बेवक़ूफ़ी नहीं तो और क्या है। ये भी कितना अजीब मामला है कि जिस क़ौम के दीन में ईमान के बाद अमल पर ज़ोर दिया गया है वही क़ौम सबसे ज़्यादा बे-अमली का शिकार है। जबकि दूसरी क़ौम जिसके यहाँ अन्धविश्वास ही सब कुछ है वो अमल के मैदान में सबसे आगे है।

आज मेरा मक़सद आपके सामने उस तंज़ीम का हल्का सा ख़ाका पेश करना है जिससे हमारा मुक़ाबला है, ताकि हम हक़ीक़त का सामना कर सकें और मुक़ाबले की कुछ तैयारी कर सकें। नीचे आरएसएस के बारे में कुछ आँकड़े दर्ज किये जा रहे हैं। आप इनको देखिये और फिर अपनी कारकर्दगी देखिये। याद रखिये सिर्फ़ क़ुनूते-नाज़िला पढ़ने से या बद्दुआ कर देने से मुक़ाबले की ताक़त को मात नहीं दी जा सकती। इसके लिये नबियों तक को मैदाने-अमल में आना पड़ा है।

आरएसएस जो कि 1925 में बनी, जिसका मक़सद है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाया जाए, मैं समझता हूँ कि भारत के हर शहरी को अपनी पसन्द का मज़हब अपनाने, उसकी तबलीग़ करने, उसके मुताबिक़ डेमोक्रेटिक तरीक़े पर हिन्दुस्तान को बनाने की आज़ादी है। आरएसएस ने अपने मक़सद को हासिल करने के लिये लम्बी जिद्दोजुहद की है। 96 साल पर फैली हुई संगठित कोशिशों का नतीजा आज सबके सामने है। आज राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, गृह-मन्त्री, रक्षा मन्त्री, लोकसभा स्पीकर, डिप्टी स्पीकर, 18 मुख्यमंत्री, 29 राज्यों के गवर्नर, 1460 विधान सभा सदस्य, 283 लोकसभा सदस्य, 58 राज्य सभा के सदस्य हैं। इसके अलावा हज़ारों ग्राम पंचायत और सैंकड़ों नगर पालिकाएँ हैं, जहाँ पर उनका क़ब्ज़ा है।

तंज़ीमी तौर पर एक लाख शाखाएँ, करोड़ों स्वयं सेवक, लाखों भारतीय मज़दूर संघ से जुड़े लोग, बीस लाख अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के नौजवान, आठ से दस करोड़ बीजेपी के सदस्य, नौ हज़ार परमानेंट कार्यकर्ता, लाखों विश्व-हिन्दू परिषद् और बजरंग दल के बजरंगी हैं जो दिन रात अपने मक़सद की तरफ़ बढ़ रहे हैं। एक लाख के क़रीब सरस्वती शिशु मन्दिर और कॉलेज हैं जिनमें पाँच लाख से ज़्यादा आचार्य और एक करोड़ से ज़्यादा स्टूडेंट्स तालीम हासिल कर रहे हैं। सैंकड़ों पब्लिकेशन्स हैं, जिन से हिन्दू तहज़ीब पर बेस्ड लिट्रेचर अलग-अलग ज़बानों में लाखों की तादाद में पब्लिश होता है। समाज के हर वर्ग के लिये उसने सोसाइटी और ट्रस्ट बनाए हैं। उलमा और मुसलमानों के लिये भी उसने अपनी अंजुमनें क़ायम की हैं। कुछ इदारों के नाम आप भी पढ़ लीजिये।

वनवासी कल्याण आश्रम, संस्कार भारती, विज्ञान भारती, लघु उद्योग भारती, सेवा सहयोग, सेवा इंटरनैशनल, राष्ट्रीय देविका समिति, आरोग्य भारती, सामाजिक समरसता मंच, श्री राम जन्म भूमि न्यास, दीन-दयाल शोध संस्थान, भारतीय विचार साधना, संस्कृत भारती, भारत विकास परिषद्, जम्मू कश्मीर स्टडी सर्किल, दृष्टि संस्थान, हिन्दू हेल्प लाइन, हिन्दू स्वयं सेवक संघ, हिन्दू मनानी, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, भारतीय किसान संघ, स्वामी विवेकानंद केंद्र, अखिल भारतीय ग्राम पंचायत, विश्व संवाद केंद्र, जन-कल्याण रक्त पेरी, इतिहास संकलन समिति, इनमें से हर इदारा अपनी अलग दुनिया रखता है। आप इनके नामों से ही इनके काम के दायरे का अन्दाज़ा लगा सकते हैं।

हर ज़बान और हर उम्र के लिये अख़बार और पत्रिकाएँ निकलती हैं। इन्क़िलाब जैसा उर्दू का अख़बार भी संघ की विचारधारा रखने वाले का ही है। पाञ्चजन्य, ऑर्गेनाइज़र, हिन्दुस्तान समाचार, तरुण भारत जैसे अख़बार संघ के इदारों से निकलते हैं। अमर उजाला, दैनिक जागरण भी उनके ही जैसी विचारधारा के लोग निकालते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दर्जनों चैनल हैं जिनपर ध्यान-ज्ञान के नाम पर गीता और रामायण का पाठ होता है, कितने ही समाचार चैनल हैं जिनका काम ही दिन-रात मोदी जी की शान में तारीफ़ों के पुल बाँधना है।

इन इदारों और संघटनो के अलावा बहुत-से ऐसे संगठन हैं जो बाक़ायदा आरएसएस से जुड़े नहीं हैं लेकिन इसके मक़सद में मददगार हैं। जैसे कि गायत्री परिवार का बहुत बड़ा नेटवर्क है जिसके बारे में आप गूगल पर सर्च कर सकते हैं। राधा स्वामी न्यास है जिसके आश्रम आपको हर जगह मिल जाएँगे। बाबा रामदेव भी इसी सिलसिले की एक कड़ी हैं।

ये काम और तैयारियाँ उन लोगों की हैं जिनके बारे में हम कहते हैं कि वो जहन्नम का ईंधन बनेंगे। लेकिन ये नहीं सोचते कि उन्होंने हमारी दुनिया ही जहन्नम बनाने की प्लानिंग कर रखी है। हम समझते हैं कि हमारे साथ ख़ुदा है, हमारा कोई कुछ नहीं कर सकता। लेकिन स्पेन, समरक़न्द और बुख़ारा की तारीख़ भूल जाते हैं। हम समझते हैं कि उत्तर-प्रदेश में बीजेपी की हार संघ की जड़ें हिला देगी। लेकिन भूल जाते हैं कि जो लोग जीतेंगे वही कौन-से हिन्दू राष्ट्र के मुख़ालिफ़ हैं। उनकी आरज़ू का महल भी राम-मन्दिर है।

आप कह सकते हैं कि हमारे पास भी दर्जनों आल इंडिया जमाअतें हैं। लाखों मस्जिदें और मदरसे हैं, जिसमें लाखों टीचर्स हैं, करोड़ों स्टूडेंट्स हैं। अख़बार और पत्रिकाएँ भी हैं, उनके साहित्य के मुक़ाबले शाइरों और अदीबों की भरमार है। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि हमारे इन इदारों और जमाअतों के मक़ासिद में बड़े-बड़े मतभेद हैं। एक संगठन से जुड़े लोग भी एक मक़सद से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते। इस्लाम जैसा इंसानियत की फ़लाह और कामयाबी का दीन रखनेवाले अपना मक़सदे-ज़िन्दगी तय करने में ही एक-दूसरे के गरेबान पकड़े हुए हैं।

अगर हमें दुनिया और आख़िरत में कामयाबी चाहिये है तो हम में से हर एक को अपना कोई न कोई ऐसा टारगेट ज़रूर तय करना चाहिये जो हमें हमारी मंज़िल की तरफ़ ले जाने में मददगार हो। हमारी मंज़िल इसके सिवा क्या है कि दुनिया अम्न व शान्ति और न्याय व इन्साफ़ का केन्द्र बन जाए। लेकिन इसके लिये जज़्बात के साथ अक़्ल और सूझबूझ का होना ज़रूरी है। इसके लिये ज़रूरी है कि हम एक सियासी क़ुव्वत बनें, संघ ने भी अपने तमाम काम सेवा और समाज के नाम पर किये हैं, मगर मक़सद सियासी ताक़त का हासिल करना है।

इसी तरह मुस्लिम उम्मत के समाजी, वेलफ़ेयर, फ़लाही और मज़हबी इदारों को अपनी साझा सियासी जमाअत पर इत्तिफ़ाक़ करना चाहिये। सियासी ताक़त की पुश्त-पनाही के बग़ैर क़ौमों की तरक़्क़ी नामुमकिन है। किसी एक लीडर की लीडरशिप में रहकर ही हुकूमत में शिरकत की राह हमवार हो सकती है। मेरी ये भी राय है कि आप लोग हरिद्वार, ऋषिकेष अपने आसपास में मौजूद आश्रमों को ज़रूर देखें ताकि आपकी आँखें मुक़ाबले की तैयारियों को अच्छी तरह देख सकें। आरएसएस और उसके जैसी दूसरी तंज़ीमों को पढ़ना और देखना हमें हरकतो-अमल करने पर आमादा करने में मददगार हो सकता है।

इस जहाने-आबो-गिल का हर तमाशा देख ले।
साज़िशें अग़ियार की और अपनी तैयारी भी देख॥

(यह लेखक के अपने विचार हैं लेखक कलीमुल हफ़ीज़ दिल्ली एआईएमआईएम के अध्यक्ष हैं)

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