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पत्रकार मीना कोटवाल के परिवार को ट्वीटर पर जातिसूचक गालियां दी, पुलिस ने एफआईआर करने से इंकार किया

सुचिता तिवारी नामक ट्वीटर यूजर ने पत्रकार की मां और दादी के बारे में जातिसूचक गालियां दी

हिंदुस्तान में दलित, मुस्लिम और नीची जाति का इंसान होना ही सबसे बड़ा जुर्म हैं, इन लोगों को अपनें ऊपर हो रहें जुर्म के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज़ करवाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता हैं।

दलित पत्रकार मीना कोटवाल के साथ भी वर्तमान समय में यहीं हो रहा हैं, ट्विटर पर सुचिता तिवारी नामक एक महिला उनके और उनके परिवार के खिलाफ जातिसूचक गालियां देती हैं. लेकीन पुलिस एफआईआर नहीं करतीं हैं।

सुचिता तिवारी ट्वीटर पर मीना कोटवाल को जातिसूचक गालियां देते हुए लिखती हैं कि “यह चमरिया फ्री का माल खा खा के बोर हो गई है. शायद यह भूल गई हैं कि इनकी दादी और मां ने कितनी लेट्रिन कमर पर रखकर ढोई हैं. अरे दो वक्त का अच्छा खाना क्या खाने लगीं अपने आपको सिर ऊंचा करके बात करने लगीं।”

इस घाटियां मानसिकता वाली टिप्पणी के विरोध में मीना कोटवाल थाने में एफआईआर दर्ज़ कराने गई तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया।

मीना कोटवाल का कहना है कि “पिछले दो घंटे से अपनी FIR दर्ज करवाने की कोशिश कर रही हूं, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है. आपके संज्ञान के लिए बता दूं कि ट्विटर पर सार्वजनिक तौर पर मुझे और मां को घृणित जातिसूचक गाली दी गई. यहां मुझे बताया जा रहा है कि आपके कहने के बाद ही FIR दर्ज होगी! क्या करूं?

मीना कोटवाल के अनुसार “तकरीबन पिछले 2 घंटे की जद्दोजहद के बाद अभी दिल्ली पुलिस ने मेरे मामले में सिर्फ शिकायत दर्ज की है. मैंने जब इन्हें कहा कि मुझे/मां को सरेआम जातिसूचक गालियां दी गई हैं तो ये कह रहे हैं कि जांच करेंगे फिर FIR हो सकती है. ऐसे कैसे न्याय मिलेगा?

मीना कोटवाल का कहना है कि “मेरे मामले को उल्टा कर दीजिए, अगर मैं किसी मुस्लिम/दलित के खिलाफ FIR करवाना चाहती तो क्या तब भी मुझे इंतजार करने के लिए कहा जाता? सोचिएगा कि क्यों जेलों में बंद दलित-आदिवासी, मुस्लिमों की संख्या देश में उनकी आबादी के अनुपात से अधिक है. कितना आसान है ना वंचितों को जेल में सड़ाना।

पत्रकार दिलीप मंडल का कहना है कि “अभियुक्त ने तिवारी या त्रिपाठी की आईडी से ट्वीट किया है. होने को वो कुछ भी हो सकता/सकती है। ख़ास सरनेम की id होने भर से दिल्ली पुलिस FIR करने से कतरा रही है। यही नाम अगर किसी ओबीसी जाति का या मुसलमान का होता, तो पुलिस अब तक उसे थाने में बिठा चुकी होती।

मीना कोटवाल के अनुसार “मैंने कई कानून के जानकारों से बात की. सबका कहना है कि SC/ST Act के तहत मामला तुरंत दर्ज होना चाहिए. लेकिन यहां की पुलिस न जाने कौन सा कानून फॉलो कर रही है जो मामला दर्ज ही नहीं करना चाहती. इसीलिए कहती हूं कि हमारे लोगों का प्रतिनिधित्व सिस्टम में होना चाहिए, तभी सुनी जाएगी।

आपको बता दें कि पत्रकार मीना कोटकाल आज एफआईआर एफआईआर दर्ज़ कराने थाने गई हैं. उनका कहना है कि निकल गई हूं दिल्ली पुलिस थाने के लिए, मुझे बुलाया गया है। उम्मीद करती हूं कि पुलिस आज मेरा FIR दर्ज करेगी और जल्द ही आरोपी सलाखों के पीछे होगा। सोचिए देश की राजधानी में जब संसद से कुछ KM की दूरी पर SC/ST एक्ट के तहत पत्रकार का FIR दर्ज नहीं हो रहा है तो गांव में क्या होता होगा?”

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