कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची में 99.32 लाख से अधिक मतदाताओं की कमी दर्ज की गई है। मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची के मुताबिक, राज्य में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 5.54 करोड़ से घटकर लगभग 4.55 करोड़ रह गई है। बड़े पैमाने पर मतदाताओं की संख्या में आई इस गिरावट ने नाम हटाने की प्रक्रिया और पात्र नागरिकों के मतदान अधिकारों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अंतिम आंकड़ों के अनुसार, पुनरीक्षण से पहले कर्नाटक में 5,54,32,314 पंजीकृत मतदाता थे, जबकि अंतिम सूची में यह संख्या घटकर 4,55,00,011 रह गई। अगस्त में प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में लगभग 4.46 करोड़ नाम दर्ज थे। इसके बाद अंतिम सूची में करीब 8.64 लाख मतदाता जोड़े गए, लेकिन पुनरीक्षण से पहले की तुलना में मतदाताओं की संख्या अब भी लगभग एक करोड़ कम है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मसौदा सूची तैयार करते समय एक करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। इनमें लगभग 80.62 लाख ऐसे मतदाता शामिल थे, जिन्हें स्थानांतरित माना गया या सत्यापन के दौरान उनके पंजीकृत पते पर नहीं पाया गया। इसके अलावा, लगभग 16.39 लाख नाम मृत घोषित किए गए मतदाताओं के थे, जबकि सात लाख से अधिक प्रविष्टियों को दोहराव वाला बताया गया। करीब 3.83 लाख नामों को अन्य श्रेणी में रखा गया। हालांकि, चुनाव आयोग ने इस अन्य श्रेणी में शामिल सभी मामलों का विस्तृत ब्योरा स्पष्ट नहीं किया है।
मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बावजूद संबंधित व्यक्ति जरूरी नहीं कि मतदान के लिए अयोग्य हों। रिपोर्ट के अनुसार, जिन लोगों के नाम स्थानांतरण या सत्यापन के दौरान नहीं मिलने के कारण हटाए गए हैं, वे नाम दोबारा जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने भी पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के लिए अभियान चलाने की बात कही है।
अंतिम मतदाता सूची में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। इसमें लगभग 2.29 करोड़ महिला मतदाता और 2.25 करोड़ से अधिक पुरुष मतदाता शामिल हैं। वहीं, 2,841 तृतीय लिंग के मतदाता दर्ज किए गए हैं। सूची में 18 से 19 वर्ष की आयु के 6.83 लाख से अधिक मतदाता हैं, जबकि 85 वर्ष से अधिक उम्र के मतदाताओं की संख्या लगभग 3.92 लाख है।
नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 61,059 फॉर्म-7 आवेदन चुनाव अधिकारियों ने खुद दाखिल किए थे, लेकिन इनमें नाम हटाने के कारणों का उल्लेख नहीं किया गया। मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत नाम हटाने के लिए कारण दर्ज करना आवश्यक है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि सुनवाई के दौरान मतदाताओं से संपर्क नहीं हो पाने की स्थिति में कुछ आवेदन उनके डिजिटल हस्ताक्षर के साथ स्वतः तैयार किए गए थे। इससे नाम हटाने की प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
चुनाव आयोग का कहना है कि पुनरीक्षण के दौरान हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के लिए अभियान चलाया जाएगा। हालांकि, अंतिम सूची से लगभग एक करोड़ मतदाताओं की कमी के बीच यह सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है कि कितने पात्र नागरिकों के नाम वास्तव में हट गए और उन्हें मतदान का अधिकार वापस दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।

