नई दिल्ली: सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ में हुई मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान 92 गवाहों के अपने बयानों से मुकरने पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है। हालांकि, अदालत ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इस मामले में आरोपमुक्त किए जाने के फैसले की दोबारा जांच करने से इनकार कर दिया।
28 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने यह मामला सुना। सोहराबुद्दीन शेख के छोटे भाई रुबाबुद्दीन शेख ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा गया था। बरी किए गए आरोपियों में गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के 21 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि 210 गवाहों में से 92 का अपने बयानों से मुकर जाना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस स्थिति में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण सुनवाई हुई थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी कहा कि अदालत कुछ गवाहों के बयान देखना चाहती है, ताकि मामले के तथ्यों की पड़ताल की जा सके। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने दलील दी कि बड़ी संख्या में गवाहों के मुकरने के कारण आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले की दोबारा समीक्षा जरूरी है।
रुबाबुद्दीन के वकील ने अदालत को बताया कि उनके भाई सोहराबुद्दीन शेख को 2005 में हैदराबाद से महाराष्ट्र की ओर बस से यात्रा करते समय सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर हिरासत में लिया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सोहराबुद्दीन की अहमदाबाद के पास मुठभेड़ में मौत हुई, जबकि उनकी पत्नी कौसर बी की तीन दिन बाद हत्या कर दी गई। मामले से जुड़े तुलसीराम प्रजापति की भी 2006 में गुजरात-राजस्थान सीमा के पास एक अन्य कथित मुठभेड़ में मौत हो गई थी। इन घटनाओं को लेकर पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि वह अमित शाह को इस मामले में आरोपमुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाले मुद्दे पर विचार नहीं करेगा। अमित शाह को दिसंबर 2014 में विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में आरोपमुक्त कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया था कि अमित शाह के आरोपमुक्त होने को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पहले भी अदालतें खारिज कर चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि वह हाई कोर्ट के फैसले के उस हिस्से की जांच नहीं करेगी, जो अमित शाह के आरोपमुक्त किए जाने से संबंधित है।
मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने 2018 में इस मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष सोहराबुद्दीन शेख और अन्य लोगों की मौत के पीछे किसी साजिश को ठोस सबूतों के आधार पर साबित नहीं कर सका। इसके बाद 2019 में बरी किए जाने के फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। हाई कोर्ट ने हाल ही में विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियों को जोड़कर आरोप साबित करने में विफल रहा। हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल बड़ी संख्या में गवाहों के मुकरने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि मुकदमे की सुनवाई निष्पक्ष नहीं हुई।
इस मामले में अमित शाह का नाम भी सीबीआई की जांच में सामने आया था और उन्हें 2010 में गिरफ्तार किया गया था। हालांकि, 2014 में उन्हें सबूतों के अभाव में आरोपमुक्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में उनके आरोपमुक्त किए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं को भी खारिज कर दिया था। मौजूदा सुनवाई में अदालत का ध्यान मुख्य रूप से 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ रुबाबुद्दीन शेख की याचिका पर केंद्रित रहा। शीर्ष अदालत ने संबंधित आरोपियों को नोटिस जारी कर मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया का रास्ता खोला है।

