पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में मदरसा बोर्ड को समाप्त करने और सभी मदरसों में जुलाई 2026 से राज्य शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम लागू करने की घोषणा की है। हरिद्वार में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने इस फैसले को शिक्षा के आधुनिकीकरण की दिशा में “ऐतिहासिक कदम” बताया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस निर्णय का उद्देश्य सभी छात्रों को, उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि से परे, समान शिक्षा प्रणाली के तहत लाना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो मदरसे नए पाठ्यक्रम को लागू नहीं करेंगे, उन्हें बंद कर दिया जाएगा।
इस मौके पर स्वामी चिदानंद मुनि समेत कई धार्मिक नेताओं ने फैसले का समर्थन किया। उनका कहना था कि इससे छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने में मदद मिलेगी। वहीं महंत रविंद्र पुरी ने अधिक कड़ा रुख अपनाते हुए देशभर में मदरसों को बंद करने की बात कही, जिससे बहस तेज हो गई।
दूसरी ओर, मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं ने इस कदम पर आपत्ति जताई। मौलाना खालिद राशिद फिरंगी महली ने इसे “गैरकानूनी” बताते हुए कहा कि बिना बोर्ड को खत्म किए भी सुधार संभव थे।
मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने भी सवाल उठाया कि मौजूदा ढांचे के भीतर बदलाव लागू किए जा सकते थे।
गौरतलब है कि यह निर्णय जुलाई 2026 से प्रभावी होगा। इससे पहले राज्य कैबिनेट ने 2025 में एक विधेयक को मंजूरी दी थी, जिसके तहत गैर-मुस्लिम समुदायों द्वारा संचालित संस्थानों को भी अल्पसंख्यक दर्जा देने का प्रावधान किया गया।
इसके अलावा, अप्रैल 2025 में राज्य में करीब 170 मदरसों को सील किए जाने की कार्रवाई भी हुई थी, जिसे लेकर विरोध और बहस देखी गई थी।
उत्तराखंड पहले ही समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन चुका है, और इन फैसलों को लेकर संवैधानिकता, धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा नीति पर व्यापक चर्चा जारी है।

