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स्कूलों और मदरसों में वंदे मातरम के पाठ पर AIMPLB ने जताया विरोध, आदेश वापस लेने की मांग

All India Muslim Personal Law Board (AIMPLB) ने पश्चिम बंगाल सरकार के उस फैसले का विरोध किया है, जिसमें सरकारी स्कूलों और मान्यता प्राप्त मदरसों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान वंदे मातरम के सभी श्लोकों का पाठ अनिवार्य किए जाने की बात कही गई है।

बोर्ड ने इस निर्णय को संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताते हुए सरकार से आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की है। साथ ही कहा है कि यदि आदेश वापस नहीं लिया जाता, तो मुस्लिम छात्रों को इससे छूट दी जानी चाहिए।

AIMPLB के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने कहा कि किसी भी छात्र को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध कोई गीत या पाठ पढ़ने के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 19, 25 और 28(3) के तहत प्राप्त अधिकारों का उल्लंघन है।

उन्होंने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता देता है, विशेषकर सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में।

बोर्ड ने Bijoe Emmanuel v. State of Kerala मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि छात्रों को उन गतिविधियों में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो उनकी सच्ची धार्मिक मान्यताओं के विपरीत हों।

AIMPLB का कहना है कि यह फैसला छात्रों के धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है तथा अनिवार्य भागीदारी के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है।

बोर्ड ने अपने बयान में कहा कि वंदे मातरम के कुछ अंशों को कई मुसलमान इस्लाम के एकेश्वरवाद (तौहीद) के सिद्धांत के अनुरूप नहीं मानते हैं। ऐसे में इसका पूर्ण पाठ अनिवार्य करना कुछ छात्रों के लिए धार्मिक और वैचारिक आपत्ति का विषय बन सकता है।

AIMPLB का तर्क है कि शिक्षा संस्थानों में इस प्रकार की अनिवार्यता छात्रों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक पहचान को प्रभावित कर सकती है।

बोर्ड ने मुस्लिम छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहने की अपील की है। साथ ही कहा है कि यदि किसी छात्र पर इस निर्देश का पालन करने के लिए दबाव डाला जाता है, तो वह कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है।

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