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सम्पादकीय

नोटबंदी का असली फायदा भृष्ट नेताओं, काला बाजारियों और एनपीए से डूबते बैंको को हुआ

आज से ठीक 5 साल पहले 8 नवंबर रात के 8 बजे भारत के आम आदमी के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ था. नोटबंदी सफल हुई या असफल सबके अपने अपने तर्क है लेकिन नोटबंदी का असली फायदा किसे हुआ वो में आपको बता देता हूँ।

दरअसल असली फायदा हुआ भृष्ट नेताओं, काला बाजारियों, एनपीए से डूबते बैंको और दोनों के साथी कुछ दलाल अकॉउंटेंट्स को. इस गणित को समझने के लिए आपको कोई रॉकेट साइंस नही सीखना है बड़ा सीधा सा गणित है।

भृष्टचारी नेताओं और ब्यूरोक्रेसी के पास अकूत काला धन था जो उन्होंने अपने काला बाजारियों, कारपोरेट साथियो और बैंको की मिलीभगत से बनाया था. सब सही चल रहा था लेकिन काले को सफेद करने वाले सरकारी टूल बैंको ने अपने हाथ खड़े कर दिए इस चेन की एक महत्वपूर्ण कड़ी टूट गई और पूरे कालाधन माफिया के लिए बड़ी समस्या खड़ी हो गयी थी और उसके लिए एक रामबाण दवा की जरुरत थी।

बैंक इतने बड़े एनपीए चलते दिवालिये होने की कगार पर पहुंच गए थे और अब और अधिक नया काला धन पैदा करने के लिए नया सफेद धन जुगाड़ने में असमर्थ थे. इतने सारे काले धन को भी सफेद करना था इन सब “विकट समस्याओं “की रामबाण दवा नोटबंदी थी, तो सबसे पहले नोटबंदी करके हमारा सारा सफेद धन बैंको के पास पहुँचाया गया।

नेताओ और काला बाजारियों पूरा काला धन होनहार लेकिन बेईमान चार्टड अकाउंटेंटस की मदद से सफेद हो गया. क्रोनी कॉरपोरेट्स को व्यापार करने के लिए काले से सफेद बने धन का कर्ज मिल गया नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए फंडिंग मिल गयी और सफल हो गई नोटबंदी।

तो मित्रों काले चोरो को जो फायदा मिलना था मिल गया आम आदमी को बैंक के सामने लगी लंबी कतारे,अपमान और नुकसान के अलावा कुछ नही मिला. हा एक चीज जरूर मिली व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान और साहब का चौराहे पर मिलने का वादा।

मित्रो मेरा यकीन मानिये अगर ऐसा धोखा किसी और देश मे होता तो वँहा की आवाम उस राजा को चोराहे तो छोड़िए उसके घर ही भेज चुकी होती, लेकिन यह कौम तो सोइ हुई है जो अपने मालिक के “मित्रों” कहने पर ही जागती है, उसकी धुन पर नाचती है औऱ वोट देने के बाद अगले 5 साल के लिए फिर सो जाती है।

आज भगवान जाग रहे है मेरी उनसे एक ही प्रार्थना है कि वो अब अपने भक्तों को भी जगा दे ताकि वो भारत के नकली भगवान के असली रूप के दर्शन कर सके।

(यह लेखक के अपने विचार हैं लेखक अपूर्व भारद्वाज ब्लॉगर हैं)

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