सम्पादकीय

शमशान घाटों के पास बसी घनी आबादी का दर्द कौन सुनेगा

कोरोना काल में रोज़ हो रही अनगिनत मौतों की ज़िम्मेदार खुले तौर पर सरकार की लचर स्वास्थय वयवस्था है जिसका परीणाम कोरोना मरीजों के साथ-साथ उनके परिवार और शमशान घाटों के पास बसी हुई घनी आबादी को भुगतना पड़ रहा है।

हम मौजूदा समस्या पर तो गंभीरता से बातें कर रहें हैं लेकिन उसके बीच ही पैदा हुई नई समस्या को नजरंदाज कर कर रहें हैं।

ऐसी ही एक बहुत बड़ी समस्या का सामना शमशान घाटों के पास बसी घनी आबादी को करना पड़ रहा है।

दिल्ली के ज़्यादातर शमशान घाट घनी आबादी के बीच ही बने हुए हैं, जब आप शमशान घाटों के पास बसी आबादी से बात करते हैं तो आपको उनका दर्द पता चलता है, वहां बसी आबादी का कहना है कि बड़ी संख्या में लाशें जलने से उन्हें सांस फूलने, आंखों में जलन और आंखों से पानी बहने जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

शमशान घाटों के आस-पास बसी आबादी को वहां से जाने पर मजबूर होना पड़ रहा है, छोटे-छोटे बच्चों और बुजुर्गों को इस धुएं से सबसे ज़्यादा परेशानी हो रही है।

जहां एक ओर कोरोना जैसी महामारी में लोगों को ऑक्सिजन के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है तो वहीं दूसरी तरफ शमशान घाट के आस-पास रहने वाले स्वस्थ लोगों को भी ज़हरीली हवा के बीच रहना पड़ रहा है।

इसी बीच सरकार एवं प्रशासन नए शमशान घाट भी घनी आबादी के बीच ही बना रही है, जबकि सरकार को यह सोचना चाहिए और ऐसे कदम उठाने चाहिए कि बड़ी आबादी के बीच बसे शमशान घाटों की बजाए लाशों को आबादी से दूर जलाया जाए।

मैं सरकार को सिर्फ समस्या ही नहीं बताऊंगा बल्कि उसके समाधान को लेकर भी सुझाव देना चाहूंगा।

यमुना किनारे बड़ी मात्रा में भूमी खाली पड़ी है, आप कश्मीरी गेट से आईटीओ की ओर जाएंगे तो हमको यहाँ भी आबादी से दूर खाली भूमि देखने को मिलेंगी लेकिन उस ओर सरकार ध्यान ही नहीं देना चाहती।

ऐसी ही खाली भूमि पूरी दिल्ली में देखी जा सकती है जैसे झड़ोदा कलां पुलिस ट्रेनिंग स्कूल, बाहरी दिल्ली में नजफगढ़ के पास, बादली मोड़, बवाना, ओखला के पास हमको बहुत बड़ी खाली भूमि देखने को मिल जाएंगी। जहां बहुत दूर तक घनी आबादी भी नही है। आप नए बन रहे शमशानों व घनी आबादी के बीच बने शमशान घाटों को वहां ले जा सकते हैं।

इसी प्रकार हमें आपदा के बीच उन समस्याओं का भी ध्यान रखना होगा जो अप्रत्यक्ष रूप से पैदा हुई है और आम लोग उन समस्याओं से जूझ रहे हैं। लेकिन कोई उन समस्याओं को देख नही पा रहा है।

थोड़ा मुश्किल ज़रूर होगा लेकिन मुझे नहीं लगता जो अपने परिजनों को खो रहे हैं वो बाकियों के जीवन के साथ हो रहे इस खिलवाड़ पर खुश होंगे !

इसी बीच मुझे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता “देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता” का एक अंश याद आता है..

यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?

यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?

यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।

(यह लेखक के अपने विचार है लेखक दीपांशु सागर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र एवं सोशल एक्टीविस्ट हैं)

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