नई दिल्ली: दिल्ली के रेस कोर्स इलाके में करीब 717 घरों को ध्वस्त किए जाने के बाद विस्थापित परिवारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। भैरों कैंप, डीआईडी कॉलोनी और मस्जिद कैंप में रहने वाले परिवारों को उनके पुराने ठिकानों से करीब 40 से 45 किलोमीटर दूर सावदा घेवरा पुनर्वास कॉलोनी में भेज दिया गया है। लोगों का कहना है कि इस कार्रवाई से उनका रोजगार छिन गया है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। कई परिवारों ने नए आवासों की खराब स्थिति और बुनियादी सुविधाओं की कमी पर भी सवाल उठाए हैं।
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इन बस्तियों में रहने वाले कई परिवार दशकों से यहां रह रहे थे। कुछ परिवारों का कहना है कि उनकी कई पीढ़ियां रेस कोर्स इलाके में बसी थीं। भूमि एवं विकास कार्यालय ने 29 अक्टूबर 2025 को बेदखली और पुनर्वास से संबंधित नोटिस जारी किए थे। इसके तहत कुछ परिवारों को पुनर्वास के लिए पात्र माना गया, जबकि अन्य परिवारों को अपात्र बताते हुए सरकारी जमीन खाली करने का निर्देश दिया गया। केंद्र सरकार और दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने अदालत में दलील दी थी कि इस जमीन की जरूरत रक्षा संबंधी बुनियादी ढांचे के विस्तार और मजबूती के लिए है।
विस्थापन के कारण सबसे ज्यादा असर लोगों की आजीविका पर पड़ा है। रेस कोर्स में घोड़ों से संबंधित काम करने वाले सलीम ने बताया कि उनका काम पूरी तरह बंद हो गया है और अब वह बेरोजगार हैं। उन्होंने सवाल किया कि जब रोजगार ही छिन गया है, तो परिवार का पेट कैसे भरेंगे। सलीम के मुताबिक, रेस कोर्स में काम करने वाले करीब 1,500 लोग इस कार्रवाई से प्रभावित हुए हैं। वहीं, भैरों कैंप के प्रधान राकेश बंसल ने कहा कि विस्थापन ने लोगों की जिंदगी तबाह कर दी है और उन्हें एक अनजान जगह पर नए सिरे से जीवन शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
बच्चों की पढ़ाई प्रभावित, अस्पताल पहुंचना भी मुश्किल
विस्थापित परिवारों ने बताया कि सावदा घेवरा में अस्पताल दूर होने के कारण आपात स्थिति में मरीजों को समय पर इलाज मिलना मुश्किल हो जाता है। राकेश बंसल के मुताबिक, कुछ लोगों की मौत दिल का दौरा पड़ने के बाद समय पर उचित इलाज नहीं मिलने के कारण हुई। उन्होंने यह भी बताया कि नए इलाके में स्कूलों की कमी है और बच्चों का पुराने स्कूलों से स्थानांतरण प्रमाणपत्र हासिल करना मुश्किल हो रहा है। कुछ बच्चों को स्कूल जाने के लिए सुबह पांच बजे उठना पड़ता है और करीब दो घंटे सफर करना पड़ता है। लोगों ने मोबाइल नेटवर्क की समस्या, परिवहन की कमी और पुनर्वास के लिए दिए गए फ्लैटों की खराब हालत की भी शिकायत की है।
मस्जिद कैंप की प्रधान शाइस्ता खान ने आरोप लगाया कि बेदखली का विरोध करने पर उन्हें भाजपा समर्थकों की ओर से धमकियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उनका परिवार पांच पीढ़ियों से रेस कोर्स इलाके में रह रहा था। शाइस्ता ने यह भी आरोप लगाया कि जब उन्होंने अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए जंगपुरा इलाके में किराये पर मकान लेने की कोशिश की, तो मकान मालिक ने उनका नाम पूछने के बाद मुस्लिम होने की वजह से मकान देने से इनकार कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि मुस्लिम होना आखिर उनका क्या कसूर है। कुछ अन्य परिवारों ने भी आरोप लगाया कि पुनर्वास सर्वेक्षण में वास्तविक निवासियों को बाहर कर दिया गया, जबकि अपात्र लोगों को आवास आवंटित किए गए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 25 अगस्त 2026 को अपने फैसले में निवासियों की याचिकाएं खारिज करते हुए उन्हें सावदा घेवरा में आवंटित आवासों में जाने का निर्देश दिया था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि पुनर्वास की प्रक्रिया सम्मानजनक होनी चाहिए और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए। अदालत ने पुनर्वास की निगरानी के लिए एक समिति गठित करने का भी निर्देश दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने 28 सितंबर 2026 को याचिकाओं का निपटारा करते हुए अधिकारियों को हाईकोर्ट के आदेशों का जल्द पालन करने और वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास के पास स्थित ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद पर भी ध्वस्तीकरण का खतरा मंडरा रहा है। भूमि एवं विकास कार्यालय ने मस्जिद परिसर को अनधिकृत बताते हुए इमाम को छह दिनों के भीतर जगह खाली करने का निर्देश दिया है। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, मस्जिद और उससे लगा कब्रिस्तान दिल्ली प्रशासन की 1977 की राजपत्र अधिसूचना में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज हैं। नई दिल्ली नगरपालिका परिषद ने भी मस्जिद को विरासत संपत्ति के रूप में मान्यता दी है। सात अक्टूबर को मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति काट दी गई थी तथा नमाजियों की आवाजाही पर भी पाबंदियां लगा दी गई थीं। दिल्ली वक्फ बोर्ड और विभिन्न मुस्लिम संगठनों ने मस्जिद की सुरक्षा तथा बुनियादी सुविधाओं को बहाल करने की मांग की है।
विस्थापित परिवारों का कहना है कि उनके घरों को तोड़कर उन्हें शहर से दूर भेज देने से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हुई है। लोगों के सामने रोजगार, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आवास की समस्याएं खड़ी हैं। एक महिला ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि सरकार ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसे वे इंसान नहीं बल्कि कीड़े-मकोड़े हों। वहीं, दूसरे निवासियों ने सवाल उठाया कि क्या गरीब परिवारों को भी सम्मानजनक जीवन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकार नहीं है।

