सम्पादकीय

मुसलमान आख़िर बीजेपी को रोकने के लिए कबतक वोट करता रहेगा? मुसलमानों ने क्या बीजेपी को रोकने का ठेका ले रखा है?

असदउद्दीन ओवैसी कहते हैं- ‘नामनिहाद सेक्युलर सियासी जमाअतों ने बीजेपी/संघ का डर दिखाके मुसलमानों को सियासी ग़ुलाम बना रखा है, मुसलमानों को इस सियासी ग़ुलामी की ज़ंजीर तोड़नी होगी, मुसलमान अपनी सियासी लीडरशिप खड़ी करे, सियासत में अपनी हिस्सेदारी तय करे। मुसलमान आख़िर बीजेपी को रोकने के लिए कबतक वोट करता रहेगा? मुसलमानों ने क्या बीजेपी को रोकने का ठेका ले रखा है? क्या बीजेपी मुसलमानों के वोट से जीतती है?’

ये बातें तो आपको ज़हर लगती हैं। आप कहते हैं- ‘ओवैसी हमें ग़ुलाम कहता है’ तो क्या ग़लत कहता है? अलीगढ़ के पूर्व विधायक ज़मीर-उ-ल्लाह साहब को जब स्टेज से जयंत चौधरी ने धक्के देके पीछे धकेल दिया था तब ज़मीर-उ-ल्लाह साहब ने मीडिया में क्या बयान दिया था? उनके बयान को सुन लीजिए।

उन्होंने कहा था- ‘मेरे साथ जो हुआ वो तो दिख गया, हालात इससे भी ज़्यादह ख़राब हैं। मुस्लिम नेता सलाम करने के लिए घण्टों-घण्टों इन नेताओं के दरवाज़ों के बाहर खड़े रहते हैं और कोई पूछता तक नहीं है’
आप ही बताइये ये सियासी ग़ुलामी नहीं तो और क्या है? ओवैसी तो सियासी ग़ुलाम फिर भी ठीक कहता है।

इमरान मसऊद साहब ने तो मुसलमानों को ही इसका ज़िम्मेदार ठहराया है। जिन्हें लग रहा है इमरान मसऊद ने अखिलेश यादव के बारे में यह कहा है कि- ‘कुत्ता बना के छोड़ा है’ वोह लोग यह बात अपने ज़ेहन से निकाल दें। इमरान मसऊद की शिकायत सहारनपुर के मुसलमानों से है। उनका कहना है- ‘मुसलमानों ने मुझे दूसरों (अखिलेश यादव) का पैर पकड़वा दिया, अगर तुम लोग (मुसलमान) मुत्तहिद होते तो मैं उनकी नहीं बल्कि वो मेरा पैर पकड़ते’ उम्मीद है आप पूरी बात समझ चुके होंगे।

इमरान मसऊद कोई छुटभय्या नेता नहीं हैं। उन्हें ख़ूब अच्छे से ज़मीनी हक़ीक़त का इल्म है। वोह भी इसी सूबे उत्तर प्रदेश के हैं। वोह कोई पेरिस से नहीं आये हैं। उनका एक बड़े सियासी घराने से तअल्लुक़ है। उनके परिवार का वेस्ट यूपी के कुछ ज़िलों में अच्छा ख़ासा असर है। अब आप ख़ुद सोचिये जब इतने बड़े सियासी लीडर की हालत ये है तो फिर पूर्व विधायक ज़मीर-उ-ल्लाह और मऊ नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष अरशद जमाल जैसे लोगों को स्टेज से धक्का ही दिया जा रहा है तो इसमें हैरत जैसी बात क्या है?

इमरान मसऊद साहब। अब जब आपने सब कुछ बयान कर ही दिया है। तो आगे आपको फ़ैसला करना होगा। क्या आप उन्हीं के साथ रहेंगे जिन्होंने आपकी इज़्ज़त का मान नहीं रखा या फिर अपने नए सियासी सफ़र का आग़ाज़ करेंगे? हम जानते हैं सपा, बसपा, कांग्रेस में रहना आपकी सियासी मजबूरी है। लेकिन ऐसी भी क्या मजबूरी जहां अपनी ग़ैरत, इज़्ज़त, ज़मीर और अपने ताज को गिरवी रखनी पड़े। आगे बढ़िये आप चाहें तो वेस्ट यूपी की सियासत में बड़ा बदलाव हो सकता है।

(यह लेखक के अपने विचार हैं लेखक शाहनवाज अंसारी मुस्लिम एक्टिविस्ट हैं)

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